23/4/20
मेरा परिचय
हिमगिरि सीना चीर चली मैं
निर्मल जल की धारा
इठलाती ,बलखाती बहती
हूँ 'सरिता' एक धारा
जहाँ -जहाँ से होकर गुजरूँ
वो तीरथ बन जाता
अपने-अपने पाप मिटाने
मानव मुझ तक आता
मीठे जल की धारा हूँ मैं
गुमां नहीं कर पाती
खारे जल से मिलकर मैं
अपना अस्तित्व मिटाती
बचपन बीता ,गई जवानी
अब है संध्या-काल
साहित्यिक अभिरुचियों से
प्रिय ! मैं हूँ मालामाल
एम.ए ,बी.एड शिक्षा पाई
अध्यापन से प्रीत निभाई
दोहे लिखती,मुक्तक लिखती
कुछ कविता औ गीत हूँ लिखती
छन्द,अलंकारों में लिखती
कोशिश सब लिखने का करती
कलाकार का मन है पाया
जीवन में संगीत सजाया
कॉलेज समय से लेकर अबतक
ढ़ेर प्रशस्ति-पत्र मिले हैं
जिन्हें प्रिय पाकर के मेरे
हरदम उर में फूल खिले है
इसी माह पाया है मैंने
'दोहा-रत्न' सम्मान सखे
'मुक्तक -शिरोमणि' बन मैंने
पाया सबसे मान सखे
इसी तरह करती जाऊँ मैं
नित साहित्य की सेवा
साहित्य की हरेक विधा की
चखती जाऊँ हर पल मेवा
ईश्वर ने इस योग्य है समझा
तीन पुत्री -धन मुझको सौंपा
पति रिटायर्ड इंजीनियर हैं
गुलाबी नगरी हमारा घर है
सुंदर है आशियाना हमारा
हर दिन उत्सव ,खेल हैं नाना (प्रकार)
एक बार जो यहां पर आये
लौट कभी न वापस पाये
आमंत्रण है सबको मेरा
कभी यहाँ पर डालो डेरा
प्राकृतिक सौंदर्य यहाँ पर
जगें कवि में भाव यहाँ पर
भावों की गंगा बहे , उर में खिलते फूल।
अपनी थकन मिटाइये,बैठ सरित के कूल।।
सरिता गर्ग 'सरि'
रिपोर्ट की समस्या
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