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कुछ दिन………

3.3
1008

कुछ दिन ऐसे एकाकी से होते हैं भीड़ मे भी कोई ना दिखाई देता है कुछ दिन ऐसे हरे भरे भी होते हैं पतझड़ मे गुलजार चमन हो जाता है कुछ दिन ऐसे भागे भागे होते हैं पास खड़े जो अभी वो पल मे खोते हैं कुछ...

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लेखक के बारे में
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कवि प्रमोद
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    15 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का कम सम्मान करती है जबकि मात्रा ठीक है । सुन्दर ।
  • author
    vijeta Kansal
    06 अक्टूबर 2024
    sach kaha..
  • author
    गीता लिम्बू
    26 जुलाई 2017
    सुदंर कविता
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    15 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का कम सम्मान करती है जबकि मात्रा ठीक है । सुन्दर ।
  • author
    vijeta Kansal
    06 अक्टूबर 2024
    sach kaha..
  • author
    गीता लिम्बू
    26 जुलाई 2017
    सुदंर कविता