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कुछ अनकही...

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4.6

तुम चाहते तो हम एक हो भी सकते थे.... न होते बर्बाद इस कदर हम लग कर गले तुम्हारे रो भी सकते थे.... जाने कोनसी थी वो गली जो मेरे घर से तेरे घर तक जाती थी... तुम चाहते तो एक आशियाना हम अपना बना भी ...