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क्षणभंगुरता

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क्षणभंगुरता आह। मेरा ये मन क्षणभंगुरता लिये समूचा जीवन। छिटकती कली हो महकती बयार है जैसे उपवन की।। ...

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लेखक के बारे में
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mukesh kumaru

लेखनी चला कर लिखने की कोशिश करता हूँ मन के भाव कागज़ पर उतर कब जाते है पता ही नहीं चलता। कुछ लोगों से पता चला कि मैं कविता लिखने लगा हूँ ।। स्नातकोत्तर ( हिन्दी, राजनीति विज्ञान) विश्वविधालय अनुदान आयोग-सहायक प्राध्यापक परीक्षा जुलाई-2016 हिन्दी विषय से उतीर्ण बी एड ( दिल्ली विश्वविद्यालय) वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में अंशकालिक सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। लेखन कार्य विभिन्न प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबारों में लेख। राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका सुमन सौरभ में निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित। प्रतिलिपि संस्था ने 250 लेखकों में चयन और प्रोत्साहन के लिए चुना। दो काव्य संग्रह प्रकाशित 1 सतरंगी सपने (काव्य संग्रह ) जनवरी-2019 2 पलाश के फूल (काव्य संग्रह ) अगस्त-2019

समीक्षा
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    16 जनवरी 2020
    समय की अवधि अर्थपूर्ण नहीं होती , अल्पावधि में भी किये गए काम की महत्ता होती है। बहुत प्रेरक कबिता👌👌👌
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    16 जनवरी 2020
    खूब सुन्दर👌👌👌 यही है क्षणभंगुरता जिसे सब विस्मृत किये बैठे है...
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    संतोष नायक
    16 जनवरी 2020
    दार्शनिक भावों से भरी रचना 'क्षणभंगुरता 'अच्छी लगी।
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    16 जनवरी 2020
    समय की अवधि अर्थपूर्ण नहीं होती , अल्पावधि में भी किये गए काम की महत्ता होती है। बहुत प्रेरक कबिता👌👌👌
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    16 जनवरी 2020
    खूब सुन्दर👌👌👌 यही है क्षणभंगुरता जिसे सब विस्मृत किये बैठे है...
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    संतोष नायक
    16 जनवरी 2020
    दार्शनिक भावों से भरी रचना 'क्षणभंगुरता 'अच्छी लगी।