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कोख की पुकार

4.0
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नींद बैठी रही रात भर सामने और अपनी कहानी सुनाती रही, मेरे भीतर उतरती रही रात भर और बाहर से मुझे थपथपाती रही। उसने हलचल मचा दी थी मन में मेरे ,जूझती थी रही सकपकाती रही, बोली क्या है किया तूने मेरे लिए ...

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लेखक के बारे में

-जन्म-स्थल -मुजफ्फरनगर [उत्तर -प्रदेश ] -शिक्षा -दिल्ली ,उत्तर प्रदेश ,अहमदाबाद -शै .यो -एम.ए [अंग्रेज़ी .हिन्दी },पी. एच डी [हिन्दी [प्रकाशन ] -टच मी नॉट,चक्र ,अपंग ,अन्ततोगत्वा ,[उपन्यास](हिन्दी सा. अकादमी ) से प्रथम पुरुस्कृत । -एक त्रिशंकु सिलसिला ( काव्य -संग्रह ) [ अप्रकाशित उपन्यास] -महायोग उपन्यास धारावाहिक रूप में ,दिल्ली-प्रेस से सितम्बर 14 से प्रकाशित -सत्रह अध्यायों में समाप्त -समिधा (IN PRESS) - विभिन्न हिन्दी पत्रिकाओं में कहानी,लेख,समीक्षा तथा कविताएँ प्रकाशित -वर्षों से मंच पर काव्य-पाठ एवं संचालन [अन्य कार्य व अनुभव ] - गुजराती व अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद ( कविता ,कहानी ,उपन्यास तथा अन्य विषयों पर पुस्तकें ) -"अहमदाबाद एक्शन ग्रुप" (असाग ) में को -ऑर्डिनेटर के रूप में अनुभव - राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान में (N I D)में हिंदी -अधिकारी " " " " " " " " -अहमदाबाद आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में वर्षों लेखन एवं कार्यक्रम प्रस्तुति -विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में गद्य -पद्य लेखन -'इसरो' ,अहमदाबाद के शै .विभाग (डेकू) के लिए दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों व नाटकों का लेखन तथा प्रस्तुति -(अब झाबुआ जाग उठा ) सीरियल का कथानक ,शीर्षक गीत ,संवाद लेखन (68 ) एपिसोड्स ) (भोपाल के लिए ) -नृत्य -नाटिकाओं का लेखन (भोपाल के लिए ) -(ए वोयेग ऑफ़ पीस एंड जॉय) लन्दन में 8 भजनों का लेखन (फ्यूज़न)के लिए - आई .आई .एम (अहमदाबाद )में हिंदी सेल के कार्य में 7 वर्षों तक संलग्न (संलग्न ) -कविता ,कहानी ,उपन्यास लेखन -'हिरण्यगर्भ:'उपन्यास -बाल -गीतों तथा कहानियों का लेखन -'एजुकेशन इनीशिएटिव्स' संस्था में हिन्दी एक्सपर्ट के रूप में संलग्न ,इसके लिए लगभग 70 बाल-कविताओं का गुजराती से हिन्दी में अनुवाद ।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    मधु सोसी
    20 अक्टूबर 2015
    समय की पुकार , हर माँ का दुलार , कभी कभी समझ नही पाती कोई कैसे माँ कैसे अपनी कोख जनी, अजनी को मार सकती  है , फिर सोचती हूँ , हाँ हो भी सकता है , प्रश्न के बहुत से पहलू है , विचारों को उद्वेलित करती रचना |
  • author
    मंजू महिमा
    15 अक्टूबर 2015
    सुन्दर शब्द मुक्ताओं से पिरोई बहुत भावपूर्ण कविता...आज की समसामयिक-समस्या से जुड़ी...प्रणव, बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाए....
  • author
    Dotookbaat
    25 अक्टूबर 2015
    ‘कोख की पुकार’ कविता  की सबसे  बड़ी खामी  शुरू में ही  सारी कविता को प्रभावहीन   और  अर्थहीन  बना देती  है कि  कवित्री  रात की कहानी  सुन रही है। ​  रात  उससे  बतिया रही है । ​ क्या  रात  के भी कोख  होती है ?  रात की कोख में बच्ची  का बीजारोपण कैसे संभव है ?  इस तरह  की कोरी कल्पना के सहारे  कविता  नहीं लिखनी चाहिए थी । ​यह इतनी बड़ी  निराधार बात है कि  इसने आगे सारी पंक्तियों को  निस्सार  कर दिया । ​ कविता  अपने  अंदर से उठती हुई  किसी आवाज़ को सुनती, उससे बात करती  तो  कविता ठीक बन कर  आती । ​ इसलिए भावो  और संरचना  की दृष्टि  से  नितांत कमज़ोर रचना ।   
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    मधु सोसी
    20 अक्टूबर 2015
    समय की पुकार , हर माँ का दुलार , कभी कभी समझ नही पाती कोई कैसे माँ कैसे अपनी कोख जनी, अजनी को मार सकती  है , फिर सोचती हूँ , हाँ हो भी सकता है , प्रश्न के बहुत से पहलू है , विचारों को उद्वेलित करती रचना |
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    मंजू महिमा
    15 अक्टूबर 2015
    सुन्दर शब्द मुक्ताओं से पिरोई बहुत भावपूर्ण कविता...आज की समसामयिक-समस्या से जुड़ी...प्रणव, बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाए....
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    Dotookbaat
    25 अक्टूबर 2015
    ‘कोख की पुकार’ कविता  की सबसे  बड़ी खामी  शुरू में ही  सारी कविता को प्रभावहीन   और  अर्थहीन  बना देती  है कि  कवित्री  रात की कहानी  सुन रही है। ​  रात  उससे  बतिया रही है । ​ क्या  रात  के भी कोख  होती है ?  रात की कोख में बच्ची  का बीजारोपण कैसे संभव है ?  इस तरह  की कोरी कल्पना के सहारे  कविता  नहीं लिखनी चाहिए थी । ​यह इतनी बड़ी  निराधार बात है कि  इसने आगे सारी पंक्तियों को  निस्सार  कर दिया । ​ कविता  अपने  अंदर से उठती हुई  किसी आवाज़ को सुनती, उससे बात करती  तो  कविता ठीक बन कर  आती । ​ इसलिए भावो  और संरचना  की दृष्टि  से  नितांत कमज़ोर रचना ।