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कौन सा है तूँ

4.6
498

कैसे मान लूँ है खुदा तूँ , मस्जिद के तख्त पर है बैठा, रहिम बनकर तूँ; चर्च के क्राॅस पर है लटका, जिजस् बनकर तूँ ; मंदिर के सिंहासन पर है बैठा, राम बनकर तूँ ; गुरूद्वारे के ताज पर है खड़ा, ...

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लेखक के बारे में

मत पुछ इस पंछी से कहाँ जाना है, पंख पसार उड़ चले हैं, इस उन्मुक्त गगन में, जहां दिन ढल जाये, बस वहीं ठिकाना है। कल आज और कल की फिकर क्यों हो हमे, जब अपनी खिदमत् करता सारा जमाना है ।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Gayatri Kharate "राधनी"
    15 अक्टूबर 2018
    nice
  • author
    Rajendra Mishra "राजन"
    30 जुलाई 2019
    अति सुन्दर है आपकी रचना
  • author
    bhagirath choudhary
    08 जून 2019
    "आस्था" nice
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    Gayatri Kharate "राधनी"
    15 अक्टूबर 2018
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  • author
    Rajendra Mishra "राजन"
    30 जुलाई 2019
    अति सुन्दर है आपकी रचना
  • author
    bhagirath choudhary
    08 जून 2019
    "आस्था" nice