कैसे मान लूँ है खुदा तूँ , मस्जिद के तख्त पर है बैठा, रहिम बनकर तूँ; चर्च के क्राॅस पर है लटका, जिजस् बनकर तूँ ; मंदिर के सिंहासन पर है बैठा, राम बनकर तूँ ; गुरूद्वारे के ताज पर है खड़ा, ...
मत पुछ इस पंछी से कहाँ जाना है,
पंख पसार उड़ चले हैं, इस उन्मुक्त गगन में,
जहां दिन ढल जाये, बस वहीं ठिकाना है।
कल आज और कल की फिकर क्यों हो हमे,
जब अपनी खिदमत् करता सारा जमाना है ।
सारांश
मत पुछ इस पंछी से कहाँ जाना है,
पंख पसार उड़ चले हैं, इस उन्मुक्त गगन में,
जहां दिन ढल जाये, बस वहीं ठिकाना है।
कल आज और कल की फिकर क्यों हो हमे,
जब अपनी खिदमत् करता सारा जमाना है ।
रिपोर्ट की समस्या
रिपोर्ट की समस्या
रिपोर्ट की समस्या