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कर्ज़ सात हज़ार का

4.5
720

कर्ज़ चढ़ा है माँ पे सात हज़ार का, छुपाकर कुछ, अपने नन्हे मुन्नो के लिये कपड़े खरिदे थे, ज़रा बाहर निकल कर तफरी की थी आईस्क्रिम पिज़्ज़ा खिलाया था-- कुछ अपनी और कुछ बच्चो की ज़रूरियात पूरी की ...

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लेखक के बारे में

"गुफ्तुगुँ करने मे मै ज़रा तंग-ए-लब हूँ मेरी ख़ामोशियाँ करती है बयाँ हाल मेरा-"बुशरा रज़ा

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Sana Ansari
    23 फ़रवरी 2019
    क्या कहूं इस नज़्म के बारे मैं बहुत बड़ा सच लिखा है आपने
  • author
    19 जनवरी 2019
    ये भावना के कर्ज में हमेशा यूं ही डूबती रहेगी मां
  • author
    अमित अस्थाना
    23 अप्रैल 2020
    बहुत ही उम्दा रचना
  • author
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  • author
    Sana Ansari
    23 फ़रवरी 2019
    क्या कहूं इस नज़्म के बारे मैं बहुत बड़ा सच लिखा है आपने
  • author
    19 जनवरी 2019
    ये भावना के कर्ज में हमेशा यूं ही डूबती रहेगी मां
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    अमित अस्थाना
    23 अप्रैल 2020
    बहुत ही उम्दा रचना