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क़र्ज़

4.3
1714

मोहन रुपए लेकर गाँव के साहूकार से अपनी गिरवी पड़ी ज़मीन छुड़वाने आया है । साहूकार बोला ," अरे बेटा तुम तो सुना शहर में अफसर हो गए हो , अब ज़मीन छुड़ा कर क्या करोगे । और हाँ घर भी पक्का क्यों करवा ...

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लेखक के बारे में
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बरखा शुक्ला
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Jugraj Dhamija Advocate
    14 फ़रवरी 2019
    आखिरी पंक्ति बहुत कुछ कह गईं। साधुवाद
  • author
    18 अगस्त 2017
    गरीब का भला सोचते कम हक मारते ज्यादा है ।
  • author
    डॉ.अलका अग्रवाल
    20 अगस्त 2019
    अंत बहुत अच्छा1
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    Jugraj Dhamija Advocate
    14 फ़रवरी 2019
    आखिरी पंक्ति बहुत कुछ कह गईं। साधुवाद
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    18 अगस्त 2017
    गरीब का भला सोचते कम हक मारते ज्यादा है ।
  • author
    डॉ.अलका अग्रवाल
    20 अगस्त 2019
    अंत बहुत अच्छा1