pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

कहीं रूठना मनाना चल रहा है

4.4
5411

कहीं रूठना मनाना चल रहा है इसी से तो ज़माना चल रहा है गमों के दौर मे क्या अब कहें हम लबों का मुस्कुराना चल रहा है किराये का है ये जिस्म तेरा जहां मे बस ठिकाना चल रहा है न जाने जिंदगी कब रूठ जाये...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में
author
अंजू मोटवानी
समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Rijvan Khan
    22 अप्रैल 2020
    बहुत अच्छा लिखती है आप आप ने इस कविता के माध्यम से बहुत कुछ समझाने की कोसिस की है, मुझे आप की ये कविता बहुत अच्छी लगी।
  • author
    kuldeep dubey
    13 फ़रवरी 2017
    शाश्वत सत्य
  • author
    HARSHAVARDHAN KUMAR
    18 मार्च 2025
    बहुत ही मार्मिक तत्व को आप अपने कविता के माध्यम से नितांत प्रदान कर रहे हैं जो समाज के घर घर में अभिशाप बन हुआ है धन्यवाद बहुत ही अच्छा लगा 🙏🌹
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Rijvan Khan
    22 अप्रैल 2020
    बहुत अच्छा लिखती है आप आप ने इस कविता के माध्यम से बहुत कुछ समझाने की कोसिस की है, मुझे आप की ये कविता बहुत अच्छी लगी।
  • author
    kuldeep dubey
    13 फ़रवरी 2017
    शाश्वत सत्य
  • author
    HARSHAVARDHAN KUMAR
    18 मार्च 2025
    बहुत ही मार्मिक तत्व को आप अपने कविता के माध्यम से नितांत प्रदान कर रहे हैं जो समाज के घर घर में अभिशाप बन हुआ है धन्यवाद बहुत ही अच्छा लगा 🙏🌹