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काफ़ल पाको मिल नि चाखो(काफल पक गए पर मैंने नहीं चखे)

4.8
466

काफल (एक गहरे लाल नीले रंग का छोटा खटा-मीठा रसीला पहाड़ी जंगली फल)जो चैत-बैसाख के महिने में पकता है। इस फल के साथ एक गढ़वाली लोक कथा जुड़ी है। कहानी प्रारंभ करने से पहले कहानी के शीर्षक का अर्थ ...

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लेखक के बारे में
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Dharm Pal Singh Rawat

"बारह आने की टोपी", "मेरा प्राथमिक विद्यालय" "ईमानदारी की सजा" और कहानी "अब तो आदत हो गई है" मेरी कहानियां मेरा परिचय हैं। तीन साल पहले दिल की भावनाओं को शब्दों में उकेरना शुरू किया। प्रत्तिलिपि पर मेरी कहानियों के अलावा मेरी रचनाएँ... 1.भरवा रोटी (कहानी संग्रह) 2.विदाई का रुपया(कहानी संग्रह) 3.झुमके(कहानी संग्रह) Amazon पर उपलब्ध 4.वो सांवली कन्नू(कहानी संग्रह) Amazon पर उपलब्ध 5.माधुरी (उपन्यास) Amazon पर उपलब्ध 6.आछेरी परी(उपन्यास) Amazon पर उपलब्ध 7.C/O 56 APO आर्मी पोस्ट ऑफिस (उपन्यास) Amazon पर उपलब्ध मेरी रचनाओं चाहे Fiction हो या Non Fiction सच्चाई का बोध कराती हैं और मेरा ध्येय भी यही है कि समाज को कुछ नया दे सकूं।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Shreya Chaturvedi
    13 मई 2019
    👌
  • author
    aparna
    31 जुलाई 2019
    आपकी कहानी ने आँखें नम कर दी सर,टेहरी गढवाल उत्तरांचल ने हमें बहुत से ओजस्वी साहित्यकार दिये हैं,शिवानी पन्त,हेमंत जोशी आदि, जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि आप भी उत्तरांचल से हैं,सादर नमन😊🙏
  • author
    21 दिसम्बर 2020
    वाह ये तो गढ़वाल की लोकप्रिय कहानीयों में से एक है कहते है मरने के बाद माँ बेटी पक्षी बन गये। आज भी काफल के सीज़न में पेड पर बैठ कर कहते है ....काफल पाकौ ...मिल नि चाखो
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    Shreya Chaturvedi
    13 मई 2019
    👌
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    aparna
    31 जुलाई 2019
    आपकी कहानी ने आँखें नम कर दी सर,टेहरी गढवाल उत्तरांचल ने हमें बहुत से ओजस्वी साहित्यकार दिये हैं,शिवानी पन्त,हेमंत जोशी आदि, जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि आप भी उत्तरांचल से हैं,सादर नमन😊🙏
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    21 दिसम्बर 2020
    वाह ये तो गढ़वाल की लोकप्रिय कहानीयों में से एक है कहते है मरने के बाद माँ बेटी पक्षी बन गये। आज भी काफल के सीज़न में पेड पर बैठ कर कहते है ....काफल पाकौ ...मिल नि चाखो