pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

जूते

4.3
574

बार बार खुल जाते है मेरे जूतों के फीते आजकल दो चार कदम चलता हूँ रुकता हूँ झुकता हूँ फिर बांधता हूँ गिरह पीठ पर चुपके से धौल जमाते बच्चे की मानिंद चौंकाते हैं खुल खुल जाते हैं मेरे जूते के फीते ...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में
author
भावना शेखर

हिमाचल प्रदेश की मूल निवासी, जन्मस्थान एवम् परवरिश दिल्ली में, शिक्षा लेडी श्रीराम कॉलेज दिल्ली वि.वि.से (एम.ए द्वय, एम.फिल, पीएचडी), गत 36 वर्षों से बिहार में निवास। उनतीस वर्षों से अध्यापन में रत। आकाशवाणी और दूरदर्शन से लम्बा जुड़ाव। जुगनी, खुली छतरी, साँझ का नीला किवाड़, मौन का महाशंख,जीतो सबका मन, एक टीचर की डायरी आदि कविता कहानी और बालगीत की नौ पुस्तकें प्रकाशित। उपन्यास "एक सपना लापता" प्रकाशनाधीन।अनेक कविताओं का जापानी भाषा मे अनुवाद। संप्रति : ए. एन. कॉलेज, पटना में अध्यापन ।

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    26 जुलाई 2018
    अन्य टिप्पणियों से यह जानकर अच्छा लगा कि आप एक शिक्षिका हैं। इसलिए आपकी कविताओं से सीखने की प्रेरणा मिलेगी, इसकी उम्मीद करता हूं। विराम चिह्नों की अनदेखी खलती है। संदर्भ और भाषा रोचक है।
  • author
    Mehak Kapoor
    04 जनवरी 2021
    would you like to publish your content in book as a co author if interested then message me on Instagram @girlslife745 or message me at whatsapp+91 7087335829
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    23 अक्टूबर 2015
    रैक , हाशिए , फितरत आदि शब्द प्रशंसा हेतु पर्याप्त हैं । राष्ट्र भाषा का कोई ध्यान न रखती एकअअत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    26 जुलाई 2018
    अन्य टिप्पणियों से यह जानकर अच्छा लगा कि आप एक शिक्षिका हैं। इसलिए आपकी कविताओं से सीखने की प्रेरणा मिलेगी, इसकी उम्मीद करता हूं। विराम चिह्नों की अनदेखी खलती है। संदर्भ और भाषा रोचक है।
  • author
    Mehak Kapoor
    04 जनवरी 2021
    would you like to publish your content in book as a co author if interested then message me on Instagram @girlslife745 or message me at whatsapp+91 7087335829
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    23 अक्टूबर 2015
    रैक , हाशिए , फितरत आदि शब्द प्रशंसा हेतु पर्याप्त हैं । राष्ट्र भाषा का कोई ध्यान न रखती एकअअत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।