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जो भी हो जिंदगी

4.3
1048

जिंदगी भर तेरी बांहों में मैं रहूँ. आँखों से प्यार का जाम पीता रहूँ अश्क हो या हँसी, साथ शामिल हो हम साथ ही मैं मरुँ, साथ जीता रहूँ || तेरे ख्वाबों को सारे सजा मैं सकूँ जिंदगी में तेरी भर दूँ सारे ...

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लेखक के बारे में

रणजीत प्रताप सिंह प्रतिलिपी के सह-संस्थापक हैं, उन्होने कमप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग एवम एम.बी.ए भी किया हुआ है। प्रतिलिपी से पहले वे सिटी बैंक(Citibank) एवम वोदाफोन(Vodafone) में काम कर चुके हैं। लेकिन इन सबसे अधिक वे अपने आप को एक पाठक के तौर पर पहचानते हैं, वे लेखक या रचनाकार बिल्कुल नहीं, लेकिन कभी कभी चंद पंक्तियां लिख देते हैं।

समीक्षा
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  • author
    Apurva Jain
    27 સપ્ટેમ્બર 2024
    nice
  • author
    sudhakararao kommuri
    02 નવેમ્બર 2021
    good nice excellent
  • author
    विरासनी सिंह "vira"
    26 એપ્રિલ 2017
    Awesome
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    Apurva Jain
    27 સપ્ટેમ્બર 2024
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    sudhakararao kommuri
    02 નવેમ્બર 2021
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    विरासनी सिंह "vira"
    26 એપ્રિલ 2017
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