
प्रतिलिपिजिस सर को ग़रूर आज है याँ ताजवरी का कल जिस पे यहीं शोर है फिर नौहागरी का आफ़ाक़ की मंज़िल से गया कौन सलामात असबाब लुटा राह में याँ हर सफ़री का ज़िन्दाँ में भी शोरिशन गयी अपने जुनूँ की अब संग मदावा है इस आशुफ़्तासरी का हर ज़ख़्म-ए-जिगर दावर-ए-महशर से हमारा इंसाफ़ तलब है तेरी बेदादगरी का इस रंग से झमके है पलक पर के कहे तू टुकड़ा है मेरा अश्क अक़ीक़े-जिगरी का ले साँस भी आहिस्ता से नाज़ुक़ है बहुत काम आफ़ाक़ है इस कारगाहे-शीशागरी का टुक मीरे-जिगर सोख़्ता की जल्द ख़बर ले क्या यार भरोसा है...
रिपोर्ट की समस्या
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