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जिंदगी की बाजी

3.1
1439

अब तक न समझ पाई मैं ये अंदाज जिंदगी का... सुलझा ही नहीं पाई मैं ये राज जिंदगी का......!! जब खाना खा कर उठ गई तो पीने का ढंग आया....... होने को है जिंदगी की शाम अब तो जीने का ढंग आया..... खुद की ...

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समीक्षा
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  • author
    Kuldeep Tiwari
    13 अक्टूबर 2015
    बेहतरीन रचना बहुत सुन्दर भाव अनुपम शब्द संयोजन एक एक शब्द जीवन्त हो चला है बहुत उम्दा नंदा जी ।साधुवाद इतनी सुन्दर रचना के liye।
  • author
    शुभ्रा कुमारी
    13 अक्टूबर 2015
    ज़िन्दगी के सच को बयां करती हुई कविता !!!बढ़िया !!!
  • author
    Raj Shree
    13 अक्टूबर 2015
    Truth of lyf!!!!!?
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    Kuldeep Tiwari
    13 अक्टूबर 2015
    बेहतरीन रचना बहुत सुन्दर भाव अनुपम शब्द संयोजन एक एक शब्द जीवन्त हो चला है बहुत उम्दा नंदा जी ।साधुवाद इतनी सुन्दर रचना के liye।
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    शुभ्रा कुमारी
    13 अक्टूबर 2015
    ज़िन्दगी के सच को बयां करती हुई कविता !!!बढ़िया !!!
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    Raj Shree
    13 अक्टूबर 2015
    Truth of lyf!!!!!?