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झूठे लोग

3.6
666

बहुत सारे झूठे लोग पृथ्वी के एक खास खंड में जमा हो गए हैं समान समय-खंड और देश-काल में रहने वाले ये लोग निर्ममता पूर्वक शोषण किया करते हैं सामाजिक नियमों का कभी साफ-सफै़यत तो कभी नौकरी के उसूलों का ...

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लेखक के बारे में
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इला कुमार

उपन्यासकार ,अनुवादक, विचारक एवम उपनिषदवेत्ता सह संपादक : विश्वा (IHA / Usa) पूर्व सह संपादक : कला वैचारिकी पूर्व साहित्य संपादक : प्रवासी दुनिया डाट कॉम

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    24 অক্টোবর 2015
    राष्ट्र भाषा का पूर्ण रूपेण अनुसरण न करती नितांत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
  • author
    शुभम पंथ
    04 ফেব্রুয়ারি 2018
    बहुत खूब ,पर गुजारिस है कि सही पद्य शैली का इस्तेमाल करे
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    24 অক্টোবর 2015
    राष्ट्र भाषा का पूर्ण रूपेण अनुसरण न करती नितांत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
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    शुभम पंथ
    04 ফেব্রুয়ারি 2018
    बहुत खूब ,पर गुजारिस है कि सही पद्य शैली का इस्तेमाल करे