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जन्म से पूर्व मुझे न मारो

4.4
466

देख रही हूं मिटता जीवन, छाया घोर अन्धेरा। हर पल जकड़े पथ में मुझको, शंकाओं का घेरा। मेरे जीवन की डोरी को, माता मत यूं तोड़ो॥ मैं भी जन्मूं इस धरती पर, मुझे अपनों से जोड़ो। क्यों इतनी निष्ठुर हुई...

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लेखक के बारे में
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सुरेखा शर्मा

डा.सुरेखा शर्मा (पूर्व हिन्दी/संस्कृत विभागाध्यक्ष) सदस्या -नीति आयोग, समीक्षक /स्वतन्त्र लेखन. पच्चास से अधिक कहानियां,आलेख,व्यंग्य, कविताएं, नाटक आदि विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कहानी संग्रह, बाल कविता,बाल एकांकी का प्रकाशन । सम्प्रति -कादम्बिनी क्लब गुड़गांव संचालिका

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Shobhana Shyam "shyam"
    30 मार्च 2017
    बहुत मार्मिक कविता , समय की pukaar
  • author
    12 अप्रैल 2019
    बहुत बढ़िया। टायपिंग त्रुटि के कारण सभी पंक्तियाँ एक दूसरे से मिलकर गद्य रचना प्रतीत हो रही हैं।
  • author
    Nirottma Tomar
    17 जनवरी 2020
    मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ
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    Shobhana Shyam "shyam"
    30 मार्च 2017
    बहुत मार्मिक कविता , समय की pukaar
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    12 अप्रैल 2019
    बहुत बढ़िया। टायपिंग त्रुटि के कारण सभी पंक्तियाँ एक दूसरे से मिलकर गद्य रचना प्रतीत हो रही हैं।
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    Nirottma Tomar
    17 जनवरी 2020
    मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ