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जज्बात

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कसक मिट गया होता समा रौशन हुआ होता हम इस कदर आप से दुर न होने को कहते अपनाया था तो अपनाया होता इस तरह न बेगाना बनाया न होता दिल में नफरत थी तो खुल कर बताया होता खुद न जलते इस सितम में हमें भी न ढकेला...

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लेखक के बारे में
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डॉली दुबे
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    17 అక్టోబరు 2015
    राष्ट्र भाषा का कोई ध्यान नहीं रखती कविता । नितांत सारहीन व अप्रासांगिक ।
  • author
    renu kapoor very innovative
    23 జూన్ 2022
    श्रेष्ठ रचना के लिए धन्यवाद आपका
  • author
    Nitin Sinha
    20 అక్టోబరు 2017
    very nice, i really appreciate it
  • author
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  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    17 అక్టోబరు 2015
    राष्ट्र भाषा का कोई ध्यान नहीं रखती कविता । नितांत सारहीन व अप्रासांगिक ।
  • author
    renu kapoor very innovative
    23 జూన్ 2022
    श्रेष्ठ रचना के लिए धन्यवाद आपका
  • author
    Nitin Sinha
    20 అక్టోబరు 2017
    very nice, i really appreciate it