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हाथ छुडाते दुख का दुख

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छोटे होते हैं सुख के पांव चलता है धीरे धीरे और आते अाते कभी रह जाता है पौना, आधा या कि चौथाई कभी किस्‍सों में ही लौटती हैं सुख की बातें---। मां कहती थी दुख भी सुख ही है जरा आगे होकर देखना पड़ता...

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लेखक के बारे में
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माया मृग

माया मृग नाम मैं ने खुद रखा | परिजनों ने नाम दिया था संदीप कुमार ,जो अब सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में रह गया है | मेरा जन्म 26 अगस्त 1965 को फाजिल्का (पंजाब ) में हुआ | जन्म के दस दिनों बाद ही परिवार को पंजाब छोड़ हनुमानगढ़ (राजस्थान ) आना पडा , मेरे जीवन के शुरुआती 25 साल यहाँ बीते | इसके बाद जयपुर आकर बस गया |पहले शिक्षा विभाग में सरकारी नौकरी की और नौकरी छोड़कर पत्रकारिता | इसके बाद मुद्रण और प्रकाशन को व्यवसाय के रूप में चुना | प्रकाशित कृतियाँ – 1 – शब्द बोलते हैं (कविता संग्रह ) – 1988 ई. 2 – ......कि जीवन ठहर न जाए (कविता संग्रह ) – 1999 ई. 3 – जमा हुआ हरापन (कविता संग्रह } – 2013 ई. 4 – एक चुप्पे शख्स की डायरी (गद्य } – 2013 ई. 5 – कात रे मन ....कात (गद्य ) – 2013 ई.

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Vivek Thakur
    09 मई 2021
    mujh Boht Khusi Huaa Ya padh ka
  • author
    anika yadav
    04 मार्च 2022
    👍
  • author
    preeti maurya "''Smile_queen""
    08 नवम्बर 2020
    👍👍
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  • author
    Vivek Thakur
    09 मई 2021
    mujh Boht Khusi Huaa Ya padh ka
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    anika yadav
    04 मार्च 2022
    👍
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    preeti maurya "''Smile_queen""
    08 नवम्बर 2020
    👍👍