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घूंघट प्रथा नहीं रही

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घूंघट हट गया , कपड़े छोटे , बदन दिखाना हुई अदा । जैसे उसकी मस्त जवानी , उसकी रहेगी सदा सदा ।। औरत संपति अपने पति की , सार्वजनिक संपति बनती है । उसका बदन और हुस्न भी उसका , औरों को क्यों भड़काती ...

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लेखक के बारे में

शिक्षा - M.A (sociology) , osmania university सारस्वत सम्मान - विद्यावाचस्पति " भारत गौरव " उपाधि प्राप्त पांच पुस्तकों के लेखक मेरा हैदराबाद में ही निवास है । ईश्वर ने हमे प्रकृति दी , हमे इस पृथ्वी पर भेजा । क्यों नहीं हम , इस प्रकृति सम्मत जीवन का पूर्ण आनद ले ? शब्दों की अभिव्यक्ति ही , इंसान की पहचान बनाती है ।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    अर्चना शर्मा
    23 अक्टूबर 2021
    "कैसे उसकी मस्त जवानी ,सदा रहेगी उसकी "" वाह क्या बात है बहुत ही गजब लिखा है आपने एक एक शब्द दिल से निकला हुआ👌👌👌👌👌👌🙏🙏💐😀😊😊
  • author
    Surendra Singh Bhoj
    24 अक्टूबर 2021
    एक तरफ मस्त जवानी भी लिख रहे हो दूजी तरफ घूंघट से करती है शिकार, कह रही हो ,कुंवारो को जीने दोगी या नहीं।
  • author
    shishir srivastava
    23 अक्टूबर 2021
    very nice and truth of new society
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    अर्चना शर्मा
    23 अक्टूबर 2021
    "कैसे उसकी मस्त जवानी ,सदा रहेगी उसकी "" वाह क्या बात है बहुत ही गजब लिखा है आपने एक एक शब्द दिल से निकला हुआ👌👌👌👌👌👌🙏🙏💐😀😊😊
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    Surendra Singh Bhoj
    24 अक्टूबर 2021
    एक तरफ मस्त जवानी भी लिख रहे हो दूजी तरफ घूंघट से करती है शिकार, कह रही हो ,कुंवारो को जीने दोगी या नहीं।
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    shishir srivastava
    23 अक्टूबर 2021
    very nice and truth of new society