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फिसलन

4.0
413

मैने पत्तों के माफिक, फैला दी थी अपनी हथेलियाँ, बरसते बादलों को, अपनी मुठ्ठी में , कैद करने की कोशिश करती ! हथेली पर सरसों जमाना सा एक खेल ! मगर, मगर मेरे हाथ ही नहीं, मैं भी धुलि धुलि सी लगने ...

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लेखक के बारे में
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कविता मुखर
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    BHUSHAN KHARE
    16 मई 2018
    बहुत अच्छी रचना
  • author
    23 अगस्त 2018
    बढ़िया .. मगर मुझे शीर्षक का कहानी से तालमेल समझ नहीं आया ....? कहानी किस फिसलन की बात कह रही है ...?
  • author
    Manjit Singh
    04 अक्टूबर 2020
    वाह जी कमाल कर दिया,आपको बार बार नमन
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    BHUSHAN KHARE
    16 मई 2018
    बहुत अच्छी रचना
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    23 अगस्त 2018
    बढ़िया .. मगर मुझे शीर्षक का कहानी से तालमेल समझ नहीं आया ....? कहानी किस फिसलन की बात कह रही है ...?
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    Manjit Singh
    04 अक्टूबर 2020
    वाह जी कमाल कर दिया,आपको बार बार नमन