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फिर तिलक लगे रघुवीर .

4.5
656

अंग-अंग सारा टूटता,छलनी हुआ शरीर कब छोड़ोगे बोलना ,अपना है कश्मीर जग सारा अब जानता,'पाक' नही करतूत भीतर से हर आदमी,छिपा हुआ बारूद जिस झंडे की साख हो ,बुलंद सितारे-चाँद झुक क्यूँ आखिर वो रहा,शरीफजादा ...

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लेखक के बारे में
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सुशील यादव

जन्म 30 जून 1952 दुर्ग छत्तीसगढ़ रिटायर्ड डिप्टी कमीश्नर , कस्टम्स,सेन्ट्रल एक्साइज एवं सर्विस टेक्स व्यंग ,कविता,कहानी का स्वतंत्र लेखन |रचनाएँ स्तरीय मासिक पत्रिकाओं यथा कादंबिनी ,सरिता ,मुक्ता तथा समाचार पत्रं के साहित्य संस्करणों में प्रकाशित |अधिकतर रचनाएँ gadayakosh.org ,रचनाकार.org ,अभिव्यक्ति ,उदंती ,साहित्य शिल्पी ,एव. साहित्य कुञ्ज में नियमित रूप से प्रकाशित |

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Jai Sharma
    22 अक्टूबर 2023
    राधे राधे सुशील जी बहुत बढ़िया बहुत खुब लगे दोहे जी
  • author
    Shivam Gupta
    01 मार्च 2019
    bahot khoob
  • author
    प्रिया सिंह "Life🧬"
    28 अगस्त 2018
    बहुत अच्छी रचना
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    Jai Sharma
    22 अक्टूबर 2023
    राधे राधे सुशील जी बहुत बढ़िया बहुत खुब लगे दोहे जी
  • author
    Shivam Gupta
    01 मार्च 2019
    bahot khoob
  • author
    प्रिया सिंह "Life🧬"
    28 अगस्त 2018
    बहुत अच्छी रचना