सुधीश का बचपन आम मध्यम वर्गीय बचपन था जरूरतों को चादर के मुताबिक समेट लेने में ही सुख ढूंढने वाला , मम्मी पापा को चुपके से अपनी जरूरतों को बेकार का खर्चा कह नज़र अंदाज़ करने वाला, वक्त जरूरत के लिए ...
मैं इंदौर से कविता वर्मा कहानियाँ कविताएँ उपन्यास लेख लिखती हूँ। मुझे लघुकथा बाल साहित्य और कहानी संग्रह के लिए अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कार मिल चुके हैं और अभी मध्यप्रदेश का प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान वागीश्वरी पुरस्कार मेरे कहानी संग्रह कछु अकथ कहानी को मिला है।
सारांश
मैं इंदौर से कविता वर्मा कहानियाँ कविताएँ उपन्यास लेख लिखती हूँ। मुझे लघुकथा बाल साहित्य और कहानी संग्रह के लिए अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कार मिल चुके हैं और अभी मध्यप्रदेश का प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान वागीश्वरी पुरस्कार मेरे कहानी संग्रह कछु अकथ कहानी को मिला है।
बहुत मासूम सी कहानी लगी। लगभग हर कोई इस "फिर कभी" से ज़रूर दो चार हुआ ही होगा। अच्छा लगा पिताजी को अपने जीवन से सीख मिली और बेटे को उसकी इच्छा पूरी करने का हौसला और समय। एक 'पुश' सबको चाहिए ही रहता है। अच्छा सा कॉन्सेप्ट है न कविताजी परिवार का, मिल जुल के कुछ उलझन सुलझाना कितना भला लगता है हृदय को।
उम्मीद है सब अपने और अपने अपनों के जीवन से सारे नहीं तो कुछ 'फ़िर कभी' तो निकाल ही पाएं।
बधाई।
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har मध्यमवर्गीय परिवार यही सोच कर अपनी इच्छाओं को मार देता हैं।।
ये कहानी पढ़ के मुझे ध्यान आया कि मैने तो इछाओ को मार ही दिया हैं.... फिर कभी का कोई ऑप्शन ही नही हैं
अब तो ऐसा लगता हैं जो हैं जैसे हैं खुश हूं बस
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बहुत मासूम सी कहानी लगी। लगभग हर कोई इस "फिर कभी" से ज़रूर दो चार हुआ ही होगा। अच्छा लगा पिताजी को अपने जीवन से सीख मिली और बेटे को उसकी इच्छा पूरी करने का हौसला और समय। एक 'पुश' सबको चाहिए ही रहता है। अच्छा सा कॉन्सेप्ट है न कविताजी परिवार का, मिल जुल के कुछ उलझन सुलझाना कितना भला लगता है हृदय को।
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