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अमर बाबू के मोहल्ले में साम्प्रदायिक दंगा हुआ था। कितने घर लुटे और कितनी बहू-बेटियों की इज़्ज़त ख़ाक हुई— कोई हिसाब न था। पाँच व्यक्तियों की जान लेकर और दस को अपंग बनाकर उन्माद शान्त हुआ था। अमर बाबू ...

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समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    12 अगस्त 2017
    कभी कभी सोच और सच में बहुत फर्क होता है... काश लोग समझें.….....
  • author
    NIIT NAJIBABAD
    19 जुलाई 2020
    अब इन कहानियों के पात्र बदलने का समय आ गया है
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    12 अगस्त 2017
    कभी कभी सोच और सच में बहुत फर्क होता है... काश लोग समझें.….....
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    NIIT NAJIBABAD
    19 जुलाई 2020
    अब इन कहानियों के पात्र बदलने का समय आ गया है