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एक फैसला

4.8
2960

"अनु....... तू पागल हो गई है क्या? कुछ समझ भी आ रहा तुझे कि तू बोल क्या रही है?"सुधा जी की आश्चर्य से आँखे बड़ी हो गई जैसे अभी कटोरों में से बाहर आ गिरेंगी। कपड़े उतारते हुए उनके हाथ हवा में ही रह ...

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लेखक के बारे में
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नमिता झा

अपने दिल की बातों को शब्दों में ढ़ाल देती हूँ, मैं तो बस अपना मन कागज़ पर उतार देती हूँ। मैं ख्वाबों को सजा कर एक नई दुनियाँ बनाती हूँ, शब्दों के पंखों पर बिठा तुम्हें वो दुनियाँ दिखाती हूँ।

समीक्षा
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  • author
    ❀꧁ω परमानन्द प्रेम ω꧂❀ सुपरफैन
    28 अप्रैल 2021
    अनु की बात भी सही है। इस संसार में सभी को समानता का अधिकार है। अपनी खुशियों को अपने हिसाब से जीने की तमन्ना भी होती है। जहाँ एक नारी अपने घर, परिवार और बच्चों की फरमाइशों को पूरा करते-करते खुद को भूल सी जाती है। कई-कई बार उसे ये याद नहीं रहता है कि वो कब मुस्कुराई थी। पहला पहलू तो ये है कि ये कहानी हर स्त्री की पीड़ा को बयां करती है। दूसरा ये की स्त्रियों की उस पीड़ा को व्यक्त किया गया है जो सामान्यतः प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती है लेकिन समझने की आवश्यकता है। शानदार लेखनी...👌👌 🎈🎈🌺🌺🌺🌺😊😊😊🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏
  • author
    Sanjay Ni_ra_la
    28 अप्रैल 2021
    भावुक करती कहानी.. बहुत ही jwalant समस्या आपने उठाया है कहानी में... लगभग 100 में से 98 नारियां इसी पीड़ा से गुजरती होंगी ऐसा मैं अनुमान के तौर पर कह रहा हूं... Anu ने अपने सपनों को सच कर दिखाया... एक mishal पेश किया कि नारी सिर्फ भोगने की वास्तु नहीं उसका भी वज़ूद है उसके पास भी दिल है ज़ज्बात है और उसका भी अस्तित्व है और उसे भी दर्द होता है is पुरुष प्रधान के दकियानूसी समाज में जहां औरतों को ही हार बात का जिम्मेदार बताकर चुप करा दिया जाता है.... बहुत ही सुकून भरा अच्छा ending किया..
  • author
    Rakesh Kumar Singh
    28 अप्रैल 2021
    एक विवाहिता स्त्री की जीवन व्यथा का अपनी लेखनी के माध्यम से बहुत ही खुबसूरत चित्रण प्रस्तुत किया है, एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति, अति सराहनीय लेखन शैली, अतुलनीय, बेमिसाल प्रसंग🌹🌹👌👌🌹🌹
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    ❀꧁ω परमानन्द प्रेम ω꧂❀ सुपरफैन
    28 अप्रैल 2021
    अनु की बात भी सही है। इस संसार में सभी को समानता का अधिकार है। अपनी खुशियों को अपने हिसाब से जीने की तमन्ना भी होती है। जहाँ एक नारी अपने घर, परिवार और बच्चों की फरमाइशों को पूरा करते-करते खुद को भूल सी जाती है। कई-कई बार उसे ये याद नहीं रहता है कि वो कब मुस्कुराई थी। पहला पहलू तो ये है कि ये कहानी हर स्त्री की पीड़ा को बयां करती है। दूसरा ये की स्त्रियों की उस पीड़ा को व्यक्त किया गया है जो सामान्यतः प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती है लेकिन समझने की आवश्यकता है। शानदार लेखनी...👌👌 🎈🎈🌺🌺🌺🌺😊😊😊🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏
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    Sanjay Ni_ra_la
    28 अप्रैल 2021
    भावुक करती कहानी.. बहुत ही jwalant समस्या आपने उठाया है कहानी में... लगभग 100 में से 98 नारियां इसी पीड़ा से गुजरती होंगी ऐसा मैं अनुमान के तौर पर कह रहा हूं... Anu ने अपने सपनों को सच कर दिखाया... एक mishal पेश किया कि नारी सिर्फ भोगने की वास्तु नहीं उसका भी वज़ूद है उसके पास भी दिल है ज़ज्बात है और उसका भी अस्तित्व है और उसे भी दर्द होता है is पुरुष प्रधान के दकियानूसी समाज में जहां औरतों को ही हार बात का जिम्मेदार बताकर चुप करा दिया जाता है.... बहुत ही सुकून भरा अच्छा ending किया..
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    Rakesh Kumar Singh
    28 अप्रैल 2021
    एक विवाहिता स्त्री की जीवन व्यथा का अपनी लेखनी के माध्यम से बहुत ही खुबसूरत चित्रण प्रस्तुत किया है, एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति, अति सराहनीय लेखन शैली, अतुलनीय, बेमिसाल प्रसंग🌹🌹👌👌🌹🌹