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एक आदिवासी युवती

4.4
1210

पिपरिया से छिंदवाड़ा की ओर आते वक्त मैं गुजर रहा था तामिया के पास एक आदिवासी गाँव से, सड़क पर राह चलती एक आदिवासी युवती को देखकर मैंने रोकी अपनी गाड़ी. अपने समीप एक कार को रुकी देख अचानक से ...

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लेखक के बारे में

अजीतपाल सिंह दैया अहमदाबाद (गुजरात) के रहने वाले हैं और जोधपुर के एम बी एम इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक हैं। कविता, कहानी, लघुकथा और उपन्यास लेखन जैसी विधा में लिखते रहें हैं। हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी, उर्दू और राजस्थानी भाषा में लेखन करते हैं। एक उपन्यास Estranged प्रकाशित हुआ है। दो कविता संग्रह 'अप्पो दीपो भव" एवं ‘फ़िलहाल’ प्रकाशित। प्रेम कहानियों की किताब "रूमान" प्रकाशित।इसके अलावा छिटपुट रचनाएँ राजस्थान पत्रिका, इतवारी पत्रिका, बालहंस, लोटपोट, जलते दीप, अकादमी कृति आदि में प्रकाशित। आकाशवाणी जोधपुर से कवितायें और सामाजिक विषयों पर वार्ताएं प्रसारित। लेखन के अतिरिक्त वह स्केचिंग, पेंटिंग और कार्टून बनाने का शौक रखते हैं। दैया की रचनाएँ ब्लॉग poetry-ajit.blogspot.in पर भी पढ़ी जा सकती हैं  

समीक्षा
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  • author
    Manjit Singh
    14 ഒക്റ്റോബര്‍ 2020
    दिल करता है आपके पैर चूम लूं कविता में आदिवासी युवती के हाव भाव दिखाकर आपने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया।अपनी किस्मत को कोसता हूं काश की मै शहर में ना पैदा होकर किसी आदिवासी बस्ती में पैदा होता उनकी परंपराएं देखता,इनके बिखरे,उलझे बाल मुझे बहुत पसंद है,देसी कपड़े,देसी खाना और कितना कहूं,ये तो मेरी आत्मा है
  • author
    Yashindra Bhardwaj "Yashi"
    10 ജനുവരി 2020
    उम्दा
  • author
    अनिता प्रदीप
    30 ആഗസ്റ്റ്‌ 2021
    सजीव चित्रण किया है,,,बहुत सुंदर 👌👌💐💐
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    Manjit Singh
    14 ഒക്റ്റോബര്‍ 2020
    दिल करता है आपके पैर चूम लूं कविता में आदिवासी युवती के हाव भाव दिखाकर आपने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया।अपनी किस्मत को कोसता हूं काश की मै शहर में ना पैदा होकर किसी आदिवासी बस्ती में पैदा होता उनकी परंपराएं देखता,इनके बिखरे,उलझे बाल मुझे बहुत पसंद है,देसी कपड़े,देसी खाना और कितना कहूं,ये तो मेरी आत्मा है
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    Yashindra Bhardwaj "Yashi"
    10 ജനുവരി 2020
    उम्दा
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    अनिता प्रदीप
    30 ആഗസ്റ്റ്‌ 2021
    सजीव चित्रण किया है,,,बहुत सुंदर 👌👌💐💐