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दूध में गिरि मक्खी

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शाम आई कयामत आ गई रोशनी थी कम भरे गिलास में मक्खि गिर गई मक्खि बेचारी किस्मत की मारी जिसे दूध समझ कर गिरी थी वह तो डिटर्जेंट का बनावटी नकली दूध था पंख फड़फड़ाती रही निकल ‌ना सकी मालिक आया ...