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देखा जबसे हमने

3.4
1873

देखा जबसे हमने उनका वो प्यारा सा चेहरा बेताब है उस दिन के लिये जब बांध के आयेंगे वो सेहरा भटकता था जो दिल ये हमारा ढूःढता रहता जो साथी बेचारा उनकी प्यार भरी निगाहों ने दे दिया दिल को सहारा उनके सिवा ...

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लेखक के बारे में
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एकता सारदा

नाम - एकता सारदा पता - सूरत (गुजरात) सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन प्रकाशित सांझा काव्य संग्रह - अपनी-अपनी धरती , अपना-अपना आसमान , अपने-अपने सपने(2014) [email protected]

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Kamlesh Barman
    11 अप्रैल 2020
    जी यह आप की सोच बहुत अच्छी थी पर स्पेज देकर लिखना चाहिए यदि बुरा ना माने तो उधारण से समझाते है जो आप ने लिखा वह दाल चावल था अलग अलग पर आप ने उसको खिचडी बना दी फिर भी जो भी पढेगा आप की सोच को अच्छा कहेगा आप अच्छा लेख सोचती है बेहतर होगा आप ऐसी सोच को दाल चावल से देखे खिचडी से नही वरना आचार्य अनिवार्य है खिचडी मे यानी लेख के लिए एक टिचर या जानकार लेखक धन्यवाद
  • author
    Pallavi Vishnoi "Pihu"
    25 फ़रवरी 2021
    nice poem but ...! writing incorrect.
  • author
    Aditya Dubay
    07 फ़रवरी 2021
    Dont know what writer want to say
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    Kamlesh Barman
    11 अप्रैल 2020
    जी यह आप की सोच बहुत अच्छी थी पर स्पेज देकर लिखना चाहिए यदि बुरा ना माने तो उधारण से समझाते है जो आप ने लिखा वह दाल चावल था अलग अलग पर आप ने उसको खिचडी बना दी फिर भी जो भी पढेगा आप की सोच को अच्छा कहेगा आप अच्छा लेख सोचती है बेहतर होगा आप ऐसी सोच को दाल चावल से देखे खिचडी से नही वरना आचार्य अनिवार्य है खिचडी मे यानी लेख के लिए एक टिचर या जानकार लेखक धन्यवाद
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    Pallavi Vishnoi "Pihu"
    25 फ़रवरी 2021
    nice poem but ...! writing incorrect.
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    Aditya Dubay
    07 फ़रवरी 2021
    Dont know what writer want to say