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दीप तले अँधेरा...

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दीप तले अंधेरा... क्यों हो रही बार बार कुदरत कुपित रहता कोई अनजाने से भय से मन कंपित... दूर दूर तक फैला है खामोशियों का मंज़र आये है जो तूफ़ान गए है उससे कितने घर बिखर... दर्द को इतनी बार गया था ...

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लेखक के बारे में

मैं पेशे से एडवोकेट हूँ पर पढ़ना और लिखना मेरा शौक है......प्रतिलिपि एक ऐसा माध्यम है जिसकी वजह से मैं अपने मन कि भावनाओं को रचनाओं के द्वारा लोगो तक पंहुचा सकती हूँ..... मेरी सभी रचनाएँ स्वरचित और मौलिक है और सर्वाधिकार सुरक्षित है ll तथा कॉपी राइट एक्ट के अंतर्गत प्रस्तावित है l अन्यथा की स्थिति मे हाई कोर्ट लखनऊ बेंच में कार्यवाही की जाएगी..l सुषमा सिंह (एडवोकेट )

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    श्वेता विजय mishra
    30 अक्टूबर 2021
    लाजवाब बेहतरीन शानदार सटीक अर्थपूर्ण सार्थक रचना बहुत बहुत खूब
  • author
    Geeta Bhadauria
    30 अक्टूबर 2021
    सूनी सी निगाहों में इंतज़ार का बसेरा। सचमुच प्रकृति कुपित है। अछि रचना
  • author
    Aditi Tandon
    30 अक्टूबर 2021
    दर्द को कितना उकेरा गया बहुत खूब लिखा है आपने 👌👌👌💐💐💐
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    श्वेता विजय mishra
    30 अक्टूबर 2021
    लाजवाब बेहतरीन शानदार सटीक अर्थपूर्ण सार्थक रचना बहुत बहुत खूब
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    Geeta Bhadauria
    30 अक्टूबर 2021
    सूनी सी निगाहों में इंतज़ार का बसेरा। सचमुच प्रकृति कुपित है। अछि रचना
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    Aditi Tandon
    30 अक्टूबर 2021
    दर्द को कितना उकेरा गया बहुत खूब लिखा है आपने 👌👌👌💐💐💐