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दादी की यादें.......!

4.4
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उनका कमरा साधारण सा छत के बीचोबीच लगभग 10 x 8 फुट का होगा , लाल -भूरे रंग के दरवाज़े ! उसमे घुसते ही बायीं ओर एक बड़ा सा संदूक !.... जिसमे दादी अपने सर्दी , गर्मी के कपड़े रखती थी और साथ ही उसमें ...

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लेखक के बारे में

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से एम कॉम करने के बाद , पिछले कुछ समय से लिखना शुरू किया , अपनी लेखनी के माध्यम से कुछ अधूरे किस्से पूरे करती हूं , कुछ सामाजिक बुराईयों का हल ढूंढने की कोशिश भी करती हूं , जिसके माध्यम से समाज को अच्छा सन्देश दे सकूँ , हाल ही में शिकायत प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार मिलने से सकारात्मक भाव आया है , समाचार पत्रों में समय समय पर लेख , कवितायें प्रकाशित होती है , आज लेखनी में जो भी पहचान बना पाई हूँ , उसका पूरा श्रेय मेरी मां को जाता है जो अब हमारे बीच नही है अगर अच्छी लेखक बन पाऊं तो उन्हें ये मेरी सच्ची श्रद्धाजंलि होगी ।

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Tara Gupta
    29 दिसम्बर 2018
    बहुत सुंदर रचना दादी की याद करा बचपन में पहुंचा दिया।
  • author
    निजा
    20 दिसम्बर 2017
    जो जज्बात नेहा तुम अपनी बातों में पिरोती हो वह मेरे दिल के करीब है. जैसे जैसे तुम कहानी कहती जाती हो वैसे यह छोटे लेकिन दिल को लुभाने वाले चित्रण दिल की गहराई में जा बसते हैं. जभी भी अकेले में होती हूँ तो यह बातें खुद सी लगती हैं :)
  • author
    Harish Dewagan
    04 अगस्त 2019
    सच में रचना जी ,वो वक़्त काफी पीछे चला गया, एक कसक है उस परिवेश में जाने की अब मुझे , ऐसा लग रहा है अब हम सब भ्रम में है, ज़िन्दगी तो वही थी ....
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    Tara Gupta
    29 दिसम्बर 2018
    बहुत सुंदर रचना दादी की याद करा बचपन में पहुंचा दिया।
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    निजा
    20 दिसम्बर 2017
    जो जज्बात नेहा तुम अपनी बातों में पिरोती हो वह मेरे दिल के करीब है. जैसे जैसे तुम कहानी कहती जाती हो वैसे यह छोटे लेकिन दिल को लुभाने वाले चित्रण दिल की गहराई में जा बसते हैं. जभी भी अकेले में होती हूँ तो यह बातें खुद सी लगती हैं :)
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    Harish Dewagan
    04 अगस्त 2019
    सच में रचना जी ,वो वक़्त काफी पीछे चला गया, एक कसक है उस परिवेश में जाने की अब मुझे , ऐसा लग रहा है अब हम सब भ्रम में है, ज़िन्दगी तो वही थी ....