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कॉलेज वाला प्यार

4.5
56383

बहुत समय बाद दीपिका ने अपना फेसबुक अकाउंट खोला कई सारे नोटिफिकेशन्स थे, कुछ मैसेजेज... दीपिका ने पहले मैसेजेज पर नज़रें घुमाई.. मैसेज बॉक्स में झाँका तो कई सारे नामों के बीच एक जाना पहचाना सा नाम...

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लेखक के बारे में

एक पहाड़ी लड़का। उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर कस्बे से हूँ और फिलहाल दिल्ली में दिन गुजार रहा हूँ। थोड़ा-बहुत लिखने का कीड़ा है तो लिखता हूँ, अच्छा बुरा कैसा भी.. पुरस्कारों का नाम नहीं गिनाऊंगा, क्योंकि ऐसा कभी लिखा नही कि कोई पुरस्कार दे🙊😂 कुछ किताब लिखने की इच्छा है, देखें भविष्य क्या दिखाता। बाकी और कुछ है भी नहीं मेरे बारे में जानने जैसा, फिर भी मुझसे जुड़ना चाहो तो- Gmail id : rajunegi739@gmail.com(इसी जीमेल को फेसबुक के सर्च बॉक्स से सर्च करने पर आपको मेरी फेसबुक प्रोफाइल भी दिख जाएगी।) वैसे मुझे कोई फॉलो करे ऐसा तो मैंने कुछ किया नही लेकिन इसके बाद भी आप मुझे ट्विटर पर फॉलो करना चाहो तो--  @RajuNegi_UK मेरा ट्विटर हैंडल।   

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Nandini Garg
    12 సెప్టెంబరు 2018
    बहुत ही अच्छी कहानी है पर एक बात समझ नहीं आती कि प्यार करने वाले हमेशा अकेले कयो रह जाते हैं कहानियों मे और कुछ हद तक जिंदगी मे भी
  • author
    Anil Agarwal
    27 జూన్ 2018
    एक अच्छी कहानी। विधवा की ज़िंदगी बड़ी ही निष्ठुर होती है। स्त्री के त्याग से अच्छा होता कि उसके जीवन की कशमकश और उसमें सफल होकर पुनः शादी का होना। इससे समाज की समयानुसार बदलती परिपक्व मानसिकता का उद्बोध होता। लेखक की यह जिम्मेदारी है कि वह बदलती परिस्थितियों का और समाज के परिपक्व होने का झण्डा बुलंद करे।
  • author
    अपर्णा तिवारी
    09 జనవరి 2017
    खो गयी थी आपकी रचना में, जब होश आया तो आँखें नम थी, लेकिन गर्व से। इससे ज्यादा ओर क्या लिखूँ?
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    Nandini Garg
    12 సెప్టెంబరు 2018
    बहुत ही अच्छी कहानी है पर एक बात समझ नहीं आती कि प्यार करने वाले हमेशा अकेले कयो रह जाते हैं कहानियों मे और कुछ हद तक जिंदगी मे भी
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    Anil Agarwal
    27 జూన్ 2018
    एक अच्छी कहानी। विधवा की ज़िंदगी बड़ी ही निष्ठुर होती है। स्त्री के त्याग से अच्छा होता कि उसके जीवन की कशमकश और उसमें सफल होकर पुनः शादी का होना। इससे समाज की समयानुसार बदलती परिपक्व मानसिकता का उद्बोध होता। लेखक की यह जिम्मेदारी है कि वह बदलती परिस्थितियों का और समाज के परिपक्व होने का झण्डा बुलंद करे।
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    अपर्णा तिवारी
    09 జనవరి 2017
    खो गयी थी आपकी रचना में, जब होश आया तो आँखें नम थी, लेकिन गर्व से। इससे ज्यादा ओर क्या लिखूँ?