आज सवेरे से ही गांव भर की हवा टाइट है.चुनावी चहल पहल है.मतदान का दिन है.प्राइमरी स्कूल के पीछे बने तालाब में कोई झाड़े फिरने नहीं गया है.फ़ौज का आदमी डूटी पर है.ननकऊ की दुल्हिन जब सवेरे सवेरे निकरी थी ...
अपने और अपने आसपास के बीते हुवे पलों को कहानी और कविताओं का रूप देने की एक अदना कोशिश करता हूँ. अब तक के खुद को उपन्यास "dehaati ladke" में पूरा उतार दिया है. बाकी का मैं बन रहा हूँ...
सारांश
अपने और अपने आसपास के बीते हुवे पलों को कहानी और कविताओं का रूप देने की एक अदना कोशिश करता हूँ. अब तक के खुद को उपन्यास "dehaati ladke" में पूरा उतार दिया है. बाकी का मैं बन रहा हूँ...
बहुत खुशी हो रही है कि आप यहां भी मिल गए। यह तो आपके उपन्यास का ही नशा है कि हमने आपको ढूंढ लिया। अभी आपकी 12 और रचनाएं पढ़नी है...
वाकई गांव की याद आ गई। सचमुच चुनाव लोकतंत्र का त्यौहार होता है
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