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चुन-चुन कर सजाया कभी---

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चुन-चुन कर ख़्वाब, जो सजाया था कभी। वो हर ख़्वाब, अब ख़्याल बन के रह गया। न जाने कब मंज़िल , समझ बैठे थे जिसे। वही मुक़ाम क्यों, सवाल बन के रह गया। हौले-हौले मिट गये थे , जो फासले कभी। वो फासला, ...

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लेखक के बारे में
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Pratima

शिव समा रहे मुझमें और मैं शून्य हो रहा हूँ। शिव समा रहे मुझमें और मैं शून्य हो रहा हूँ। ------------------ हमारी सभी रचनाएँ पूर्णतः मौलिक एवं स्वरचित हैं। जिनके सभी अधिकार हमारे पास सुरक्षित हैं।

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    24 जून 2023
    दर्द झलक रही है रचना मे। किसीको ना पाने की। बहुत बहुत बेहतरीन रचना देवी जी
  • author
    Sanjay Ni_ra_la
    23 जून 2023
    बहुत सुन्दर लेखन, एक से बढ़कर एक अशआर, अंतिम दो अशआर पर और काम किया जा सकता है, पूरे नज्म का जायका उभर जाएगा... Bravo Zulu Bravo Zulu
  • author
    23 जून 2023
    विशाल शब्द कोष, और बेमिसाल सोच.... रचना को अप्रतिम बना देती है.... have no words, except to this... 🌿🟣🔵🌿
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    24 जून 2023
    दर्द झलक रही है रचना मे। किसीको ना पाने की। बहुत बहुत बेहतरीन रचना देवी जी
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    Sanjay Ni_ra_la
    23 जून 2023
    बहुत सुन्दर लेखन, एक से बढ़कर एक अशआर, अंतिम दो अशआर पर और काम किया जा सकता है, पूरे नज्म का जायका उभर जाएगा... Bravo Zulu Bravo Zulu
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    23 जून 2023
    विशाल शब्द कोष, और बेमिसाल सोच.... रचना को अप्रतिम बना देती है.... have no words, except to this... 🌿🟣🔵🌿