चुन-चुन कर ख़्वाब, जो सजाया था कभी। वो हर ख़्वाब, अब ख़्याल बन के रह गया। न जाने कब मंज़िल , समझ बैठे थे जिसे। वही मुक़ाम क्यों, सवाल बन के रह गया। हौले-हौले मिट गये थे , जो फासले कभी। वो फासला, ...
शिव समा रहे मुझमें
और मैं शून्य हो रहा हूँ।
शिव समा रहे मुझमें
और मैं शून्य हो रहा हूँ।
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हमारी सभी रचनाएँ पूर्णतः मौलिक एवं स्वरचित हैं। जिनके सभी अधिकार हमारे पास सुरक्षित हैं।
सारांश
शिव समा रहे मुझमें
और मैं शून्य हो रहा हूँ।
शिव समा रहे मुझमें
और मैं शून्य हो रहा हूँ।
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रिपोर्ट की समस्या
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