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चिंगारी सत्य की

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4.3

ना जाने कब रूकेगा, ना जाने कब थमेगा गहन चिंतन करता मन! राहों से निकलती राहें और उनसे फूटती अनगिनत पगडंडियाँ कहाँ तक ले जाएँगी अंतर्मन की सोंच को कब तक भटकना है इनपर यूँ हीं दिशाहीन आसमान में चमकता...