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छोड़ आया हूँ

4.5
755

हरी धरती , खुले नीले गगन को छोड़ आया हूँ कि कुछ सिक्कों की ख़ातिर मैं चमन को छोड़ आया हूँ विदेशी भूमि पर माना लिए फिरता हूँ तन लेकिन वतन की सौंधी मिट्टी में मैं मन को छोड़ आया हूँ पराये घर में कब मिलता ...

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लेखक के बारे में
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प्राण शर्मा
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Ritu Sharma
    17 जुलाई 2019
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    19 अक्टूबर 2015
    ख़ातिर जैसे शब्द ही सबकुछ कह रहे हैं । राष्ट्र भाषा का कोई सम्मान नहीं करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता ।
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    30 नवम्बर 2022
    हम कहीं भी जाएँ अपनापन साथ नहीं छोड़ती , को अभिव्यक्त करती सुन्दर रचना । हार्दिक साधुवाद
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    Ritu Sharma
    17 जुलाई 2019
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    19 अक्टूबर 2015
    ख़ातिर जैसे शब्द ही सबकुछ कह रहे हैं । राष्ट्र भाषा का कोई सम्मान नहीं करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता ।
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    अरविन्द सिन्हा
    30 नवम्बर 2022
    हम कहीं भी जाएँ अपनापन साथ नहीं छोड़ती , को अभिव्यक्त करती सुन्दर रचना । हार्दिक साधुवाद