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बारात की बत्ती

4.3
6802

"अरे मोनुआ, जल्दी जाओ बत्ती सब बंटा जायेगा नै तो!" मोनू की माँ ने दरवाज़े की ओट से आवाज़ लगाई, पर मोनू मोहल्ले के बच्चों के साथ लट्टू घुमाता रहा। अचानक उसके सर के पीछे चट से एक तमाचा पड़ा, घूमा तो ...

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लेखक के बारे में
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ऋषभ आदर्श

मैं कुछ भी लिखता हूँ... एक सुकून शब्दों में पाता हूँ.. हर्फ़ों के दरम्यान खुद को भुलाता हूँ... मैं यादों की स्याही में कलम डुबो कर... खुद को लिखता हूँ और उसे पढता हूँ.. मैं कुछ भी लिखता हूँ!!

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    निशा राय
    20 ఫిబ్రవరి 2019
    थोड़ी ही देर में साहेब गुम हो गया और मोनू के पाँव चलने लगे.... क्या सुंदर चित्रण किया है वाह ऐसा लग रहा है जैसे कोई लघु फिल्म आँखों के सामने चल रही हो। बधाई आपको
  • author
    29 మే 2017
    बहुत अच्छी कहानी। लाजवाब!
  • author
    पूर्णिमा
    29 మే 2017
    good
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    निशा राय
    20 ఫిబ్రవరి 2019
    थोड़ी ही देर में साहेब गुम हो गया और मोनू के पाँव चलने लगे.... क्या सुंदर चित्रण किया है वाह ऐसा लग रहा है जैसे कोई लघु फिल्म आँखों के सामने चल रही हो। बधाई आपको
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    29 మే 2017
    बहुत अच्छी कहानी। लाजवाब!
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    पूर्णिमा
    29 మే 2017
    good