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और क्या

4.3
976

ज़िन्दगी बन गयी इक सजा, और क्य़ा हर ख़ुशी हो गयी अब हवा, और क्या हम थे यूँ चल रहे, अरमान मचल रहे हो गया सब धुआं, और क्या ख्वाब देखे थे जो, वो हुए लापता किसको कोसूं भला और कोसूं भी क्या खुद के ही थे...

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लेखक के बारे में

रणजीत प्रताप सिंह प्रतिलिपी के सह-संस्थापक हैं, उन्होने कमप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग एवम एम.बी.ए भी किया हुआ है। प्रतिलिपी से पहले वे सिटी बैंक(Citibank) एवम वोदाफोन(Vodafone) में काम कर चुके हैं। लेकिन इन सबसे अधिक वे अपने आप को एक पाठक के तौर पर पहचानते हैं, वे लेखक या रचनाकार बिल्कुल नहीं, लेकिन कभी कभी चंद पंक्तियां लिख देते हैं।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    12 जनवरी 2017
    बहुत खूब.. कहूँ अब .. और क्या.. 👍
  • author
    13 जनवरी 2017
    आदरणीय रंजीत जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल है। एक दो बार अगर बोलकर इसे पढें, तो खुद ब खुद ही पता चल जायेगा की कहाँ मात्राएँ अधिक हैं और कहाँ उनका लोप हो गया है। सुन्दर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई!
  • author
    meenakshi
    19 फ़रवरी 2017
    अति सुंदर
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    12 जनवरी 2017
    बहुत खूब.. कहूँ अब .. और क्या.. 👍
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    13 जनवरी 2017
    आदरणीय रंजीत जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल है। एक दो बार अगर बोलकर इसे पढें, तो खुद ब खुद ही पता चल जायेगा की कहाँ मात्राएँ अधिक हैं और कहाँ उनका लोप हो गया है। सुन्दर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई!
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    meenakshi
    19 फ़रवरी 2017
    अति सुंदर