ज़िन्दगी बन गयी इक सजा, और क्य़ा
हर ख़ुशी हो गयी अब हवा, और क्या हम थे यूँ चल रहे, अरमान मचल रहे
हो गया सब धुआं, और क्या ख्वाब देखे थे जो, वो हुए लापता
किसको कोसूं भला और कोसूं भी क्या खुद के ही थे...
रणजीत प्रताप सिंह प्रतिलिपी के सह-संस्थापक हैं, उन्होने कमप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग एवम एम.बी.ए भी किया हुआ है। प्रतिलिपी से पहले वे सिटी बैंक(Citibank) एवम वोदाफोन(Vodafone) में काम कर चुके हैं। लेकिन इन सबसे अधिक वे अपने आप को एक पाठक के तौर पर पहचानते हैं, वे लेखक या रचनाकार बिल्कुल नहीं, लेकिन कभी कभी चंद पंक्तियां लिख देते हैं।
सारांश
रणजीत प्रताप सिंह प्रतिलिपी के सह-संस्थापक हैं, उन्होने कमप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग एवम एम.बी.ए भी किया हुआ है। प्रतिलिपी से पहले वे सिटी बैंक(Citibank) एवम वोदाफोन(Vodafone) में काम कर चुके हैं। लेकिन इन सबसे अधिक वे अपने आप को एक पाठक के तौर पर पहचानते हैं, वे लेखक या रचनाकार बिल्कुल नहीं, लेकिन कभी कभी चंद पंक्तियां लिख देते हैं।
आदरणीय रंजीत जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल है। एक दो बार अगर बोलकर इसे पढें, तो खुद ब खुद ही पता चल जायेगा की कहाँ मात्राएँ अधिक हैं और कहाँ उनका लोप हो गया है। सुन्दर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई!
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आदरणीय रंजीत जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल है। एक दो बार अगर बोलकर इसे पढें, तो खुद ब खुद ही पता चल जायेगा की कहाँ मात्राएँ अधिक हैं और कहाँ उनका लोप हो गया है। सुन्दर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई!
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