दशानन! मैं सीता हूँ - भूमिजा। सहनशील हूँ परन्तु कायर नहीं, अपार शक्ति एवं ऊर्जा का भंडार हूँ मैं, चाहती तो पंचवटी में ही नष्ट कर सकती थी तुम्हें। तुम क्या सोंचते हो स्वयंबर में जिस शिव धनुष को ...
मैं रक्षा मंत्रालय से राजपत्रित अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हूॅ। लिखना और पढना मुझे आत्मसंतुष्टि देता है। वैसे तो लेखन बहुत पहले प्रारम्भ कर दिया था लेकिन संयुक्त परिवार की पारिवारिक जिम्मेदारियों, लम्बे कार्य के घंटे, बच्चे के दायित्व ने लेखन को बाधित करते रहे। प्रतिलिपि के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर मिला है और साथ ही आप सभी दोस्तों से मिलने का सौभाग्य।
सारांश
मैं रक्षा मंत्रालय से राजपत्रित अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हूॅ। लिखना और पढना मुझे आत्मसंतुष्टि देता है। वैसे तो लेखन बहुत पहले प्रारम्भ कर दिया था लेकिन संयुक्त परिवार की पारिवारिक जिम्मेदारियों, लम्बे कार्य के घंटे, बच्चे के दायित्व ने लेखन को बाधित करते रहे। प्रतिलिपि के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर मिला है और साथ ही आप सभी दोस्तों से मिलने का सौभाग्य।
भूमिजा सीता का एक नया दृष्टिकोण बहुत ही रुचिकर लगा और सार्थक भी। स्त्री - संबंधी विषयों में रुचि होने के कारण मेरे अनुसार यह एक सुंदर रचना है।लेखिका को मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई। कृपया मेरी रचनाओं को भी प्रोत्साहन दें।
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भूमिजा सीता का एक नया दृष्टिकोण बहुत ही रुचिकर लगा और सार्थक भी। स्त्री - संबंधी विषयों में रुचि होने के कारण मेरे अनुसार यह एक सुंदर रचना है।लेखिका को मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई। कृपया मेरी रचनाओं को भी प्रोत्साहन दें।
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