बचपन में जब हम कोई छह सात साल के रहे होंगे, घर के पीछे वाले दरवाज़े से शर्मा आंटी के घर भागने में हम दोनों भाई बहन को बहुत मज़ा आता था।आंटी हमें देखकर खुश हो जाती थीं।हम घन्टों उनके छोटे से बेटे ...
बचपन की यादें ताजा हो गई...युद्ध और माता पिता की हिदायतें ब्लैकआउट्स...आर्मी के ट्रक और उनका मार्च...गर्व है भारतीय सेना पर...लेकिन शहीदों को श्रद्धांजलि देकर इति नहीं करनी चाहिए बल्कि उनके परिवार को भी संभालना सरकार वा हम सबका कर्तव्य है...उत्तम रचना
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इस तरह की सैनिकोंकी, जवानों की ह्रदयस्पर्शी सत्यकथायें भावुक होनेपर, रोनेपर मजबूर कर देती है. उनका बलिदान, उनके प्रति श्रध्दा बढाता है. कोटी कोटी प्रणाम शहिदोंको!!!
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