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अपराध बोध

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4.2

ऐसा फिसला मन कि संस्कारों की पोटली जा गिरी लालच की आग में आँख खुली तो आत्मा मूसल की तरह कुचलने लगी अस्तित्व को पश्चाताप के समुद्र में आंसूओं का नमक मिला तो बिखर गया ठोस पत्थर तैरने लगा दुःख...