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अपना एक कोना

4.5
819

जीती है स्त्री रिश्तों में स्वयं को उम्र भर तलाशती है इन रिश्तों से अलग अपना एक कोना जहां उसकी साँसें सिर्फ उसकी हों उन्मुक्त हंसी में डूबा अस्तित्व हो सारे सपने सिर्फ उसके हों रेशा - रेशा मन का ...

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लेखक के बारे में

शिक्षा – एम्.ए. ( हिन्दी ) सम्प्रति – चीफ एडिटर,प्रतिलिपि प्रकाशित पुस्तकें – तिराहा,बेगम हज़रत महल (उपन्यास ) अनतर्मन के द्वीप, प्यार का एनिमेशन,पॉर्न स्टार और अन्य कहानियां – कहानी संग्रह कई कवितायें ,कहानियाँ एवं लेख पत्र - पत्रिकाओं और कई ब्लॉग्स पर प्रकाशित।

समीक्षा
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  • author
    Archana Gangwar
    08 अगस्त 2016
    स्त्री का अपना कोना जिंदगी भर उसकी राह ताकता रहा ...........वाह उम्र भर न जाने कितने कोनो की धुल झाड़ती कभी अपने हिस्से के कोने तक पहुँच ही नहीं paati
  • author
    Vijay Kumar Soni
    03 मार्च 2019
    स्त्री जो चाहती है अपना भी एक कोना। शानदार अभिव्यक्ति।
  • author
    06 अगस्त 2016
    आपकी कविता अधिकांश भारतीय महिलाओं के जीवन की सच्चाई है
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    Archana Gangwar
    08 अगस्त 2016
    स्त्री का अपना कोना जिंदगी भर उसकी राह ताकता रहा ...........वाह उम्र भर न जाने कितने कोनो की धुल झाड़ती कभी अपने हिस्से के कोने तक पहुँच ही नहीं paati
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    Vijay Kumar Soni
    03 मार्च 2019
    स्त्री जो चाहती है अपना भी एक कोना। शानदार अभिव्यक्ति।
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    06 अगस्त 2016
    आपकी कविता अधिकांश भारतीय महिलाओं के जीवन की सच्चाई है