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अन्जाने पाप की सजा

4.1
20516

आज बुढ़ापे के मोड़ पर लेटे लेटे अपने अतीत को याद कर रही थी | कैसे एक गुंडे की विधवा होने उसने दोबारा घर बसाया.और सब खुशियां दोबारा मिली जो किसी और के हिस्से क थी| किसी की सौतन बन कर इस घर में आयी थी | जब घर के लोग उस पर जुर्म करते ताने मरते, मुझे कभी उस पर तरस नहीं आया |शायद कभी खुद भी लोगो का साथ दिय ा उसे परेशान करने में| वो बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी शायद इसी लिए मैं इस घर में आ पायी थी | उस समय उसका दर्द मैं महसूस नहीं कर पाती थी | उससे कहीं न कहीं नफरत थी मन में, जब के उसे नफरत करनी चाहिए...

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लेखक के बारे में
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पूजा मिश्रा
समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    purnima Kumari
    18 अप्रैल 2018
    awsme
  • author
    सौरदीप अधिकारी
    10 मार्च 2025
    नमस्कार। आपकी रचना पढ़के बहुत अच्छा लगा। ये सत्य मे एक बहुत अच्छा लेखन है। ओर लिखते रहिए। मै भी प्रतिलिपि हिंदी में लिखता हूं। मुझे प्रतिलिपि में अनुसरण करते हुए साथ जुड़े रहने का आपसे आन्तरिक अनुरोध रहा। धन्यवाद सहित शुभकामनाएं।
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    purnima Kumari
    18 अप्रैल 2018
    awsme
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    सौरदीप अधिकारी
    10 मार्च 2025
    नमस्कार। आपकी रचना पढ़के बहुत अच्छा लगा। ये सत्य मे एक बहुत अच्छा लेखन है। ओर लिखते रहिए। मै भी प्रतिलिपि हिंदी में लिखता हूं। मुझे प्रतिलिपि में अनुसरण करते हुए साथ जुड़े रहने का आपसे आन्तरिक अनुरोध रहा। धन्यवाद सहित शुभकामनाएं।