** नज़्म ** गोया की उनको हमसे... मुहब्बत नहीं रही! हमें भी उनको पाने की... हसरत नहीं रही! ढलती उमर में उनकी वाजिब है शिकायत, वो शोखियां वो हुस्न... वो शरारत नहीं रही! कसकर अपनी बाँहों ...
कल काव्यपाठ में आपने sabdon से mehfil में आग लगा दिए थे आप...
अभी कहां हार मान कर बैठते हो तुम
रकिबों को क्यूँ आजाद छोड़ते हो तुम
एक आवाज पर निराला दौड़ा आएगा
अपने आप को क्यूँ इतना सताते हो तुम
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