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अब मैं...

4.4
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ये दुनिया बाज़ार इश्क़ दुकान प्रेम व्यापार हमेशा से। बिक रही सजी हुई देहें और आतिशें चन्द ख्वाब रिश्ते दरोदीवार और आसमान... लेकिन अब दौर बदला है। सुनो! आज कतारबद्ध तुम खड़े बिकाऊ चाहत के सिक्के मेरे ...

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लेखक के बारे में
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डॉ. छवि निगम
समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Mansi Bahadur
    21 अक्टूबर 2015
    The tables have turned and how...nicely depicted with clever use of Hindi and Urdu words..Kudos!!
  • author
    Samar Nigam
    14 अक्टूबर 2015
    Good control over words, nicely written.
  • author
    Ashwini Kumar Vishnu
    26 अक्टूबर 2015
    स्त्री को सिर्फ़ देह और भोग्या मानने वाले पुरुष ने उसे बिकाऊ माल समझकर तरह-तरह से शोषित-उत्पीड़ित किया है. प्रस्तुत रचना पुरुष की इसी प्रवृत्ति का प्रखरता से विरोध करती है. आज की स्त्री में वह साहस है, और उसके पास वे साधन भी हैं कि वह पुरुष को ख़रीद सकती है, नीलाम कर सकती है. सरल शब्दों में सघन भाव अभिव्यक्त करती उत्तम कृति. हार्दिक बधाई  
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    Mansi Bahadur
    21 अक्टूबर 2015
    The tables have turned and how...nicely depicted with clever use of Hindi and Urdu words..Kudos!!
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    Samar Nigam
    14 अक्टूबर 2015
    Good control over words, nicely written.
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    Ashwini Kumar Vishnu
    26 अक्टूबर 2015
    स्त्री को सिर्फ़ देह और भोग्या मानने वाले पुरुष ने उसे बिकाऊ माल समझकर तरह-तरह से शोषित-उत्पीड़ित किया है. प्रस्तुत रचना पुरुष की इसी प्रवृत्ति का प्रखरता से विरोध करती है. आज की स्त्री में वह साहस है, और उसके पास वे साधन भी हैं कि वह पुरुष को ख़रीद सकती है, नीलाम कर सकती है. सरल शब्दों में सघन भाव अभिव्यक्त करती उत्तम कृति. हार्दिक बधाई