कहते हैं आस्था यानी की विश्वास एक ऐसे शक्ति है जो पत्थर को भी भगवान बना देती है !
इसलिए यह कहानी एक बुढ़िया के विश्वास की है !जो एक पाखंडी पर पूरा विश्वास करती है !
यह कहानी शुरू होती है एक ...
बन्धुवर श्री पवन किशोर जी बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद। कहानी का कथानक अभी चल रही अन्य कहानियों से अलग और आकर्षक है। हम सब की आदत है कि चाहे रास्ता कितना ही टेढामेढा और झाङ झखाङ भरा हो, हम आस्था की पूँछ पकङे आगे बढते जाते हैं। आपकी इस कहानी में एक भ्रम का आवरण पाठक पर बना रहता है और वह अंत तक पहुँच भी जाता है। लेकिन या तो आप हिन्दी भाषा भाषी नहीं है या फिर आपने हिन्दी ठीक से पढी नहीं है। प्रारम्भ से कहानी के अंत तक भाषा की इतनी अशुद्धियां हैं कि पढने वाला झुंझला कर आपको कोई अपशब्द भी कह दे, तो आश्चर्य नहीं।क्या आपने इस कहानी को पढा है?य़दि नहीं पढा है तो अब पढिये और खुद अनुभव कीजिए कि इतनी गलतियां करके आप स्वयं को लेखक कैसे मान सकते हैं। कृपया अन्यथा न लें,पाठक का धर्म है कि वह कोई भी रचना पढकर अपने प्रिय लेखक को बधाई दे और यदि उसे रचना में कोई त्रुटि नजर आती है तो लेखक को साधिकार बताये। वरना लिखना क्या और पढना क्या? झूठी और क्षणिक वाहवाही इंसान को रास्ते से भटका देती हैं।शुभकामनाएं।
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बन्धुवर श्री पवन किशोर जी बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद। कहानी का कथानक अभी चल रही अन्य कहानियों से अलग और आकर्षक है। हम सब की आदत है कि चाहे रास्ता कितना ही टेढामेढा और झाङ झखाङ भरा हो, हम आस्था की पूँछ पकङे आगे बढते जाते हैं। आपकी इस कहानी में एक भ्रम का आवरण पाठक पर बना रहता है और वह अंत तक पहुँच भी जाता है। लेकिन या तो आप हिन्दी भाषा भाषी नहीं है या फिर आपने हिन्दी ठीक से पढी नहीं है। प्रारम्भ से कहानी के अंत तक भाषा की इतनी अशुद्धियां हैं कि पढने वाला झुंझला कर आपको कोई अपशब्द भी कह दे, तो आश्चर्य नहीं।क्या आपने इस कहानी को पढा है?य़दि नहीं पढा है तो अब पढिये और खुद अनुभव कीजिए कि इतनी गलतियां करके आप स्वयं को लेखक कैसे मान सकते हैं। कृपया अन्यथा न लें,पाठक का धर्म है कि वह कोई भी रचना पढकर अपने प्रिय लेखक को बधाई दे और यदि उसे रचना में कोई त्रुटि नजर आती है तो लेखक को साधिकार बताये। वरना लिखना क्या और पढना क्या? झूठी और क्षणिक वाहवाही इंसान को रास्ते से भटका देती हैं।शुभकामनाएं।
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