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आस्था की शक्ति

4.3
12495

कहते हैं आस्था यानी की विश्वास एक ऐसे शक्ति है जो पत्थर को भी भगवान बना देती है ! इसलिए यह कहानी एक बुढ़िया के विश्वास की है !जो एक पाखंडी पर पूरा विश्वास करती है ! यह कहानी शुरू होती है एक ...

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लेखक के बारे में
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pawan kishor

I'm pawan and I am a writer.my stories are published on pratilipi.com,matrubharti.com,pk putr.blogger.com .

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    02 नवम्बर 2019
    बन्धुवर श्री पवन किशोर जी बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद। कहानी का कथानक अभी चल रही अन्य कहानियों से अलग और आकर्षक है। हम सब की आदत है कि चाहे रास्ता कितना ही टेढामेढा और झाङ झखाङ भरा हो, हम आस्था की पूँछ पकङे आगे बढते जाते हैं। आपकी इस कहानी में एक भ्रम का आवरण पाठक पर बना रहता है और वह अंत तक पहुँच भी जाता है। लेकिन या तो आप हिन्दी भाषा भाषी नहीं है या फिर आपने हिन्दी ठीक से पढी नहीं है। प्रारम्भ से कहानी के अंत तक भाषा की इतनी अशुद्धियां हैं कि पढने वाला झुंझला कर आपको कोई अपशब्द भी कह दे, तो आश्चर्य नहीं।क्या आपने इस कहानी को पढा है?य़दि नहीं पढा है तो अब पढिये और खुद अनुभव कीजिए कि इतनी गलतियां करके आप स्वयं को लेखक कैसे मान सकते हैं। कृपया अन्यथा न लें,पाठक का धर्म है कि वह कोई भी रचना पढकर अपने प्रिय लेखक को बधाई दे और यदि उसे रचना में कोई त्रुटि नजर आती है तो लेखक को साधिकार बताये। वरना लिखना क्या और पढना क्या? झूठी और क्षणिक वाहवाही इंसान को रास्ते से भटका देती हैं।शुभकामनाएं।
  • author
    Ritu Gupta
    24 फ़रवरी 2020
    बिलकुल सही बात है आस्था मे ही शक्ति होती है।आस्था के कारण ही तो हमारे देश हे पेड,पौधो,पशुओ की पूजा की जाती है
  • author
    Vishnu Kashid
    18 अक्टूबर 2020
    बहूतसुंदर
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    02 नवम्बर 2019
    बन्धुवर श्री पवन किशोर जी बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद। कहानी का कथानक अभी चल रही अन्य कहानियों से अलग और आकर्षक है। हम सब की आदत है कि चाहे रास्ता कितना ही टेढामेढा और झाङ झखाङ भरा हो, हम आस्था की पूँछ पकङे आगे बढते जाते हैं। आपकी इस कहानी में एक भ्रम का आवरण पाठक पर बना रहता है और वह अंत तक पहुँच भी जाता है। लेकिन या तो आप हिन्दी भाषा भाषी नहीं है या फिर आपने हिन्दी ठीक से पढी नहीं है। प्रारम्भ से कहानी के अंत तक भाषा की इतनी अशुद्धियां हैं कि पढने वाला झुंझला कर आपको कोई अपशब्द भी कह दे, तो आश्चर्य नहीं।क्या आपने इस कहानी को पढा है?य़दि नहीं पढा है तो अब पढिये और खुद अनुभव कीजिए कि इतनी गलतियां करके आप स्वयं को लेखक कैसे मान सकते हैं। कृपया अन्यथा न लें,पाठक का धर्म है कि वह कोई भी रचना पढकर अपने प्रिय लेखक को बधाई दे और यदि उसे रचना में कोई त्रुटि नजर आती है तो लेखक को साधिकार बताये। वरना लिखना क्या और पढना क्या? झूठी और क्षणिक वाहवाही इंसान को रास्ते से भटका देती हैं।शुभकामनाएं।
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    Ritu Gupta
    24 फ़रवरी 2020
    बिलकुल सही बात है आस्था मे ही शक्ति होती है।आस्था के कारण ही तो हमारे देश हे पेड,पौधो,पशुओ की पूजा की जाती है
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    Vishnu Kashid
    18 अक्टूबर 2020
    बहूतसुंदर