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आज की वैदेही

4.3
19653

पिता के घर में आभा के कोई अरमान पूरे न हो सके थे, जब पहली कविता लिखी तो पिता ने मजाक बनाया, बड़ी बहन ने ये कहते हुए कविता फाड़ दी कि मुझसे मुकाबला करेगी। दूसरी उपेक्षा तब झेली जब इण्टरमीडिएट में टाॅप...

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लेखक के बारे में

सम्पादक गाथांतर हिन्दी त्रैमासिक आजमगढ उत्तर प्रदेश

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    नेहा शर्मा "'नेह'"
    22 अगस्त 2017
    बहुत बढ़िया। स्त्री को स्वाभिमान के लिए स्वयं खड़ा होना होगा। पुरूष तो हर हाल में पुरूष ही है। राम मिले तो भी सहती है और रावण मिले तो भी सहती है। आवश्यकता है बस नारी के दुर्गा बन जाने की न कि सीता बने रहने की।
  • author
    Pratyasha Priti
    30 जुलाई 2018
    वाह क्या लेखनी है आपकी! "पुरुष कब राम बन जाए कब रावण पता नहीं, इसलिए आज की वैदेही अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं खींचती है और अंततः अग्नि परीक्षा से बच जाती है।" बहुत ही सुंदर 👌👌
  • author
    vandana choubey "गुड़िया"
    03 जून 2019
    जवाब नहीं, आपने वास्विकता को धरातल पर उतार दिया है।पुरुष सीता तो चाहता है मगर खुद राम नही बन सकता।सभी पुरुष औरतों के देह से उठकर क्यों नहीं देखते? हृदयस्पर्शी कहानी।
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    नेहा शर्मा "'नेह'"
    22 अगस्त 2017
    बहुत बढ़िया। स्त्री को स्वाभिमान के लिए स्वयं खड़ा होना होगा। पुरूष तो हर हाल में पुरूष ही है। राम मिले तो भी सहती है और रावण मिले तो भी सहती है। आवश्यकता है बस नारी के दुर्गा बन जाने की न कि सीता बने रहने की।
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    Pratyasha Priti
    30 जुलाई 2018
    वाह क्या लेखनी है आपकी! "पुरुष कब राम बन जाए कब रावण पता नहीं, इसलिए आज की वैदेही अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं खींचती है और अंततः अग्नि परीक्षा से बच जाती है।" बहुत ही सुंदर 👌👌
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    vandana choubey "गुड़िया"
    03 जून 2019
    जवाब नहीं, आपने वास्विकता को धरातल पर उतार दिया है।पुरुष सीता तो चाहता है मगर खुद राम नही बन सकता।सभी पुरुष औरतों के देह से उठकर क्यों नहीं देखते? हृदयस्पर्शी कहानी।