पिता के घर में आभा के कोई अरमान पूरे न हो सके थे, जब पहली कविता लिखी तो पिता ने मजाक बनाया, बड़ी बहन ने ये कहते हुए कविता फाड़ दी कि मुझसे मुकाबला करेगी। दूसरी उपेक्षा तब झेली जब इण्टरमीडिएट में टाॅप...
बहुत बढ़िया। स्त्री को स्वाभिमान के लिए स्वयं खड़ा होना होगा। पुरूष तो हर हाल में पुरूष ही है। राम मिले तो भी सहती है और रावण मिले तो भी सहती है। आवश्यकता है बस नारी के दुर्गा बन जाने की न कि सीता बने रहने की।
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वाह क्या लेखनी है आपकी! "पुरुष कब राम बन जाए कब रावण पता नहीं, इसलिए आज की वैदेही अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं खींचती है और अंततः अग्नि परीक्षा से बच जाती है।" बहुत ही सुंदर 👌👌
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जवाब नहीं, आपने वास्विकता को धरातल पर उतार दिया है।पुरुष सीता तो चाहता है मगर खुद राम नही बन सकता।सभी पुरुष औरतों के देह से उठकर क्यों नहीं देखते?
हृदयस्पर्शी कहानी।
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बहुत बढ़िया। स्त्री को स्वाभिमान के लिए स्वयं खड़ा होना होगा। पुरूष तो हर हाल में पुरूष ही है। राम मिले तो भी सहती है और रावण मिले तो भी सहती है। आवश्यकता है बस नारी के दुर्गा बन जाने की न कि सीता बने रहने की।
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