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एक खत माँ के नाम

4.6
7329

बस से उतरते ही मुझे मेरे कदम इतने भारी लगने लगे कि मानो दोनों पाँवों पर 100 किलो लोहा बांध दिया हो। हल्की ठंड थी, मौसम सुहाना था, शहर नैनीताल था पर फिर भी मेरे चेहरे पे बारह बजे हुए थे। लोग इस ...

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लेखक के बारे में
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Harish Pandey

"बेधड़क सा जियूँ, बेफिकर सा रहूँ... हो रसूख़ यूँ मेरा, जैसे जिस्म में लहू!!!"

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    इंदु कपूर
    16 नवम्बर 2019
    समझ नहीं आ रहा कि किन शब्दों में कहानी की तारीफ करुं।👌👌👌
  • author
    Rajkishor Sharma
    30 सितम्बर 2020
    aise saput ko koti koti pranam aur aise beer saput ki maa ko bhi pranam
  • author
    Jagjit Tehlan
    01 अक्टूबर 2020
    salute to each and every true soldier and there family
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    इंदु कपूर
    16 नवम्बर 2019
    समझ नहीं आ रहा कि किन शब्दों में कहानी की तारीफ करुं।👌👌👌
  • author
    Rajkishor Sharma
    30 सितम्बर 2020
    aise saput ko koti koti pranam aur aise beer saput ki maa ko bhi pranam
  • author
    Jagjit Tehlan
    01 अक्टूबर 2020
    salute to each and every true soldier and there family