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मैं सूर्य देखना चाहता हूं!

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पहले उसकी ज़िन्दगी में ऐसा नहीं था। सूर्य पूरे इतमीनान से सदियों से जी रहाथा। कोई बड़ी हलचल उसकी ज़िन्दगी में नहीं मची थी। उसका जल-जीवन तमाम तिलिस्मोंसे भरा हुआ था, लेकिन उसमें कोई विस्मय नहीं था। एक ...

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लेखक के बारे में
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डॉ.अभिज्ञात

शिक्षा- केदारनाथ सिंह व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर हिन्दी में कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएच.डी। प्रकाशित कविता संग्रह-एक अदहन हमारे अन्दर, भग्न नीड़ के आर-पार, सरापता हूं, आवारा हवाओं के ख़िलाफ़ चुपचाप, वह हथेली, दी हुई नींद, खुशी ठहरती है कितनी देर, बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई, कुछ दुःख कुछ चुप्पियां, ज़रा सा नास्टेल्जिया । उपन्यास-अनचाहे दरवाज़े पर, कला बाज़ार। कहानी संग्रह- तीसरी बीवी, मनुष्य और मत्स्यकन्या। कई कहानियों पर फ़ीचर फिल्में निर्माणाधीन। पत्र-पत्रिकाओं में आलोचनात्मक टिप्पणियां भी प्रकाशित। आकांक्षा संस्कृति सम्मान, कादम्बिनी लघुकथा पुरस्कार,  कौमी एकता अवार्ड, डॉ.अम्बेडकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान, कबीर सम्मान, राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार से समादृत। बंगला फ़िल्म एक्सपोर्टः मिथ्ये किन्तु सोत्ती, एका एवं एका, जशोदा, महामंत्र एवं हिन्दी फीचर फिल्म दि जर्नी में अभिनय। पेंटिग का शौक। पेशे से पत्रकार। जनसत्ता, अमर उजाला, वेबदुनिया डाट काम, दैनिक जागरण के बाद सम्प्रति सन्मार्ग (दैनिक) में डिप्टी न्यूज़ एडिटर।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Shashikant Tripathi
    13 நவம்பர் 2018
    साइंस फिक्शन पढ़ने को मिला बहुत दिन बाद ।
  • author
    Mohan Arora
    26 ஆகஸ்ட் 2022
    अति सुन्दर
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    Shashikant Tripathi
    13 நவம்பர் 2018
    साइंस फिक्शन पढ़ने को मिला बहुत दिन बाद ।
  • author
    Mohan Arora
    26 ஆகஸ்ட் 2022
    अति सुन्दर