हिंदी के अधिकांश या कहें कि अस्सी प्रतिशत पत्रकारों ने शायद ही आज तक कोई हिंदी के लेखक की कोई कहानी पूरी पढ़ी हो। उन्होंने हंस, ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश या तद्भव और मंतव्य जैसी किसी पत्रिका का नाम...

प्रतिलिपिहिंदी के अधिकांश या कहें कि अस्सी प्रतिशत पत्रकारों ने शायद ही आज तक कोई हिंदी के लेखक की कोई कहानी पूरी पढ़ी हो। उन्होंने हंस, ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश या तद्भव और मंतव्य जैसी किसी पत्रिका का नाम...