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बैरागी मन

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अब लगता है मन जीवन का मैं बैरागी हो जाऊँ, सुध-बुध अपनी खोकर मैं तुझमें खो जाऊँ। एक दिन उठूँ सवेरे तड़के, देखूँ मैं उड़ते पंछी को, तरुओं की सरसराहट, पत्तों में खोजूँ जीवन का राग। देखूँ कल-कल पानी...

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लेखक के बारे में
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Artee Pathak

> "शब्द मेरे लिए सिर्फ़ कहानी नहीं, एक ताक़त हैं — जो दिलों को जोड़ते हैं। ‘Aartey Pathak’ के रूप में, मैं भावनाओं, सपनों और सच्चाई को शब्दों में पिरोती हूँ। मेरा मक़सद है — हर कहानी के साथ आपको एक नई दुनिया का सफ़र देना और अपने लेखन से आपके दिल में अपनी पहचान बनाना।"

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