थकीहारी,अंग-अंग तोड़ती, वो बेचारी औरत, "कामवाली बाई", सुबह से शाम तक,कितने घर खटती, रात का इंतजार करती, घर-घर से मिला खाना। खुद न खाके इकठ्ठा कर लाती, कच्चा-पका,अच्छा-बुरा जो भी रहा, उसे सहेजती...

प्रतिलिपिथकीहारी,अंग-अंग तोड़ती, वो बेचारी औरत, "कामवाली बाई", सुबह से शाम तक,कितने घर खटती, रात का इंतजार करती, घर-घर से मिला खाना। खुद न खाके इकठ्ठा कर लाती, कच्चा-पका,अच्छा-बुरा जो भी रहा, उसे सहेजती...